*जो आपका नहीं, उसके लिए दुख क्यों?

एक आदमी सागर के किनारे टहल रहा था। एकाएक उसकी नजर चांदी की एक छड़ी पर पड़ी, जो बहती-बहती किनारे आ लगी थी वह खुश हुआ और झटपट छड़ी उठा ली अब वह छड़ी लेकर टहलने लगा..
धूप चढ़ी तो उसका मन सागर में नहाने का हुआ उसने सोचा, अगर छड़ी को किनारे रखकर नहाऊंगा, तो कोई ले जाएगा इसलिए वह छड़ी हाथ में ही पकड़ कर नहाने लगा तभी एक ऊंची लहर आई और तेजी से छड़ी को बहाकर ले गई वह अफसोस करने लगा और दुखी हो कर तट पर आ बैठा..

उधर से एक संत आ रहे थे उसे उदास देख पूछा, इतने दुखी क्यों हो? उसने बताया, स्वामी जी नहाते हुए मेरी चांदी की छड़ी सागर में बह गई संत ने हैरानी जताई, छड़ी लेकर नहा रहे थे? वह बोला, क्या करता? किनारे रख कर नहाता, तो कोई ले जा सकता था।

लेकिन चांदी की छड़ी ले कर नहाने क्यों आए थे?: स्वामी जी ने पूछा।

ले कर नहीं आया था, वह तो यहीं पड़ी मिली थी: उसने बताया।

सुन कर स्वामी जी हंसने लगे और बोले: जब वह तुम्हारी थी ही नहीं, तो फिर दुख या उदासी कैसी?

कभी कुछ खुशियां अनायास मिल जाती हैं और कभी कुछ श्रम करने और कष्ट उठाने से मिलती हैं जो खुशियां अनायास मिलती हैं, परमात्मा की ओर से मिलती हैं, उन्हें सराहने का हमारे पास समय नहीं होता।
इंसान व्यस्त है तमाम ऐसे सुखों की गिनती करने में, जो उसके पास नहीं हैं - आलीशान बंगला, शानदार कपडे ,गाड़ी  वगैरह और भूल जाता है कि एक दिन सब कुछ यूं ही छोड़कर उसे अगले सफर में निकल जाना है.

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