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हम कैसे बेवकूफ बन रहें हैं

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हम कैसे बेवकूफ बन रहें हैं  1. पहले हम दस रुपये किलो टमाटर खरीद कर ताज़ी चटनी खाते थे । अब हम 150 रुपये किलो का दो महीने पुराना टोमैटो सॉस खाते हैं । 2. पहले हम एक दिन पुराना पानी भी नहीं पीते थे ,आजकल हम 20 रुपये वाली तीन महीने पुरानी बोतल पीते हैं । 3. पहले हम सुबह शाम ताज़ा दूध पीते थे । आजकल हम पांच दिन पुराना थैली वाला दूध amul ताज़ा के नाम से पीते हैं ।  4. पहले हम ताज़ा जूस पीते थे अब हम 6 महीने पुराना artifical जूस real के नाम से पीते हैं  5. पहले हम ताज़ा जलजीरा पीते थे अब हम दो महीने पुराना कोल्ड ड्रिंक 60 रुपये लीटर में पीते हैं । 6. 500 या 700 किलो वाले काजू बादाम जो शरीर की immunity बढ़ाते हैं वह हमें महंगा लगता है लेकिन 400 वाला सड़े हुए मैदे से बना पिज़्ज़ा हमको सस्ता लगता है   7 . पहले हम सुबह का बना हुआ खाना शाम को भी नहीं खाते थे और अब हम कंपनियो की बनी बासी चीज़ें बड़े चाव से खाते हैं । जबकि हम जानते हैं कि कंपनियों द्वारा बनी हुई रेडीमेड चीजों में कई तरह के केमिकल्स preservatives के खूबसूरत नाम के तले मिलाये जाते हैं । क्या हमारा ...

शर्मिष्ठा नाम की कोई सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर बच्ची है।

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शर्मिष्ठा नाम की कोई सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर बच्ची है। जल्दी फेमस होने के लिए शॉर्टकट अपना रही थी। पाकिस्तान और बॉलीवुड को गरियाते-गरियाते भावनाओं में बह कर हुजूर-ए-पीस की शान में गुस्ताखी कर बैठी। अब शांतिप्रिय कौम का खून उबाल मार रहा है। "सर तन से जुदा" के नारे लगाए जा रहे हैं। बच्ची अब घबरा कर माफी मांग रही है।  . खैर, सर तन से जुदा नहीं होगा। ये कोई शरिया मुल्क नहीं है। पर जो बातें उस बच्ची ने कहीं, वे बेहद घटिया भाषा में बेहद गैरजरूरी बातें थी। जो उसे हिन्दू शेरनी समझ रहे हों, उन्हें मैं बता दूं कि मोहतरमा की जुबान हिंदुओं को भी नहीं बख्शती। एक वीडियो देखा, कह रही थीं कि - भगवान मुझे पैदा करते समय बहुत हगे थे।  . बहरहाल, बच्ची उम्र में छोटी है। हम तो यही चाहेंगे कि उसे नादान समझ कर माफ कर दिया जाए। मैं ये भी चाहूंगा कि ऐसे लोगों को पकड़ कर महीने पंद्रह दिन के लिए सबक सिखाने के लिए तिहाड़ की सैर जरूर करानी चाहिए। ताकि ये भविष्य में पॉपुलैरिटी के लिए सस्ते हथकंडे अपनाने से बाज आएं।  . एक प्रैक्टिकल सलाह मैं अपने अग्निमूतक हिन्दू शेरों/शेरनियों को भी देना चाहूं...

बात कड़वी है मगर सच्ची है

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नरसंहार में मारे गए 27 लोग केवल एक मृत्यु नहीं मरे हैं *वो दस बार मरे हैं ...*… एक परिवार बतौर टूरिस्ट कश्मीर गया अच्छी खासी लागत लगा कर साल भर की थकान और अपने इलाके की गर्मी से बचने कश्मीर गया। *◼️पहली मौत मरा :* वहाँ आतंकी हमला हुआ और परिवार का मुखिया अपने परिवार की सुरक्षा के लिए थर थर काँपता हुआ। *◼️दूसरी मौत मरा :* जब उसे खचेड़ कर बाहर निकाला गया तो बंदूकों को देख खौफ से वो। *◼️तीसरी मौत वो तब मरा :* जब उससे पूछा गया तेरा मजहब क्या है? तेरा धर्म क्या है? इस पल उसे अहसास हुआ मेरा धर्म ही मेरी मौत का कारण है। *◼️चौथी मौत वो तब मरा :* जब उसे उसके परिवार के सामने पैंट खोलने को कहा गया शारीरिक रूप से एक अंग के छेदन न होने से उसे गोली खानी होगी ये भी एक मृत्यु से कम नहीं। *◼️पाँचवीं मौत वो मरा :* जब गोलियों ने उसका शरीर छलनी कर डाला उसके परिवार के समक्ष, पत्नी बच्चों के क्रंदन के बीच प्राण छूटना, आत्मा का शरीर से साथ छूटना, सोच कर देखिए कितनी वेदना भरी होगी। *◼️छठी मौत वो तब मरा :* जब उसकी आत्मा ने देखा कि उसकी पत्नी उसके हत्यारों से मौत माँग रही है और वो अट्टहास करते कह रहे...

हिंदू राष्ट्र क्यों आवश्यक है?*

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*हिंदू राष्ट्र क्यों आवश्यक है?* ==================== *भारत के स्वतंत्रता संग्राम के ईतिहास से रहस्योदघाटन* *अंग्रेजों से स्वतंत्रता की लड़ाई में अधिकांश हिंदुओं ने भाग लिया।  गांधी नीति से   जबरदस्ती  मुसलमानों को भी इसमें जोड़ दिया गया। अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में मुसलमानों को भागीदार बना दिया ।* *इससे उनके दिमाग में हो गया कि देश को स्वतंत्र कराने में हमारा भी हाथ है।* *जबकि वह अपने खलीफा को बचाने अँग्रेजों ले लड़े थे, जोकि इनका धर्मगुरू होता था।  तुर्की के खलीफा को बचाने के लिऐ मुसलमान अंग्रेजों के खिलाफ थे। उनका भारत से कुछ लेना देना नहीं था।* *मुसलमान केवल तुर्की के खलीफा को बचाने के लिए लड़े थे पर गांधी ने उसको भारत छोड़ो आंदोलन से जोड़कर मिला लिया।*   *इसका उन्होंने फायदा जरूर लिया कि अंग्रेजों से आजाद होते ही अपना हिस्सा मांग लिया और पाकिस्तान के रूप में पाकिस्तान और बांग्लादेश भारत से अलग हो गया ।*  *और अब जब पहले बंटवारा हो गया तो दूसरी गलती गांधी नेहरू ने यह की कि जब देश के टुकड़े हुऐ तो मुसलमानों को पाकिस्तान के रूप में इसला...

सबके अपने अपने पाखंड हैं।

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परम्पराऐं विकृत होती हैं तो उन्हें सम्भालने की जिम्मेदारी भी हम परंपरा के वाहकों की है।पहले ही इतनी सजगता, सावधानी और गतिशीलता रखते कि अपनी दाढ़ी दूसरे के हाथ मे नहीं देनी पड़े।एक बीमारी छोड़ कर दूसरी में गिरना, हम भारतीयों का दुर्भाग्य है।एक नशा छोड़ा, दूसरा पकड़ लिया।जो लोग दूसरों के कहे पर चलते हैं, उनको तो भटकना ही पड़ता है। कभी धर्म अर्थ काम मोक्ष की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती थी। आज मीडिया द्वारा थोपी गई प्रतिस्पर्धा होती है।"इस महिला ने इतने पुरुषों से समागम किया!"या"इस पुरूष ने इतनी लड़कियों के साथ सम्बन्ध बनाया!"क्या ये स्वस्थ सन्देश हैं?यदि कभी जूते खाने की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई तो भारतीय प्रथम आएंगे क्योंकि वे वामपंथियों के बिछाए एजेंडे के अनुसार चलते हैं, उनका स्वयं का कोई मौलिक चिंतन बचा ही नहीं है। तेरहवीं एक छलावरण शब्द है जो वामपंथियों ने हिंदुओं पर वैसे ही थोपा है जैसे हिंदुओं द्वारा स्वयं की बर्बादी के इकोसिस्टम को सेक्युलरिज्म कहा गया। तुष्टीकरण को त्याग,  कामवासना मिटाने की इच्छा को प्यार कहा, नंगे होने को बोल्ड कहा, ठरक को रिलेशनशिप कहा, परिव...

आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता

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आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता  1993 किस्तवार :  बस हाइजेक की गई , सिर्फ हिन्दू मार दिए बाकी छोड़ दिए   1998 वंधामा : सिर्फ हिन्दुओ के घर मे चुन कर 23 लोग मारे  1998 ऊधमपुर :  प्राणकोट गाव में हिन्दुओ को जबर्जस्ती कलमा पढ़ने को कहा , 29 को मारा  2000 , चित्तीसिंहपुर  गाव मे 36 सिख चुन कर मारे  2000: 105 हिन्दू अमरनाथ यात्री मारे , 2001 मे भी मारे , 2017 मे भी  2003 नंदीमार्ग गाँव :  24 हिन्दू घर से निकाल कर मारे  2006 डोडा :  54 हिन्दू चुनकर मारे , जिनमे 4 छोटी 3 साल की बच्चीया भी , इतना बेदर्दी से मारा की पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को हार्टअटैक आ गया  2021 : स्कूल मे हमला किया , चुन चुन कर सिर्फ हिन्दू टीचर मारे  जैसे लोग ये सब भूल गए 2025 पहलगांम भी भूल जाएंगे... आर्थिक बहिष्कार

*एक बात कह रही हूं जनाब मौलाना संजीव खन्ना*

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*एक बात कह रही हूं जनाब मौलाना संजीव खन्ना* जब आप अदालत में बैठते हैं तब आप भले ही हिंदू सिख जैन ना हो  लेकिन आप एक आप लोग एक कट्टर मुस्लिम जरूर बन जाते हैं  आप मेरे कुछ सवालों का जवाब दीजिए उसके बाद मैं मान लूंगा कि आप  अदालत में बैठते हैं तो किसी भी धर्म के मानने वाले नहीं रहते भारतीय अदालतों के कुछ दुर्लभ किससे सुनाता हूँ 1:♦️तीस्ता जावेद सीतलवाड़ एकदम जेल जाने वाली थी गुजरात हाईकोर्ट ने उनकी जमानत खारिज कर दी थी। तभी दिल्ली में बैठे कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के एक जज को फोन किया और उस जज ने उन्हें फोन की सुनवाई पर अग्रिम जमानत दे दिया।  ना भूतो ना भविष्यति।  भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में आज तक किसी अभियुक्त की न  फोन  पर सुनवाई हुई थी ना कभी होगी आज तक किसी हिंदू मुजरिम को सुप्रीम कोर्ट ने फोन पर जमानत क्यों नहीं दिया ? यह सुविधा सिर्फ एक मुस्लिम मुजरिम तीस्ता जावेद को क्यों दिया गया 2:♦️याकूब मेमन के लिए रात को 2:00 बजे प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट के एक जज के घर पर जाते हैं और वह जज रात को 2 बजे ही सुनवाई कर देता है और बकायदा भारत...