आत्मा और देह का द्वैत कैसे दूर हो सकता है अगर ये भिन्न हैं?"

"आत्मा और देह का द्वैत कैसे दूर हो सकता है अगर ये भिन्न हैं?"
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यह संभव है अगर जो भी किया जाय समग्रता से किया जाय। तब शरीर हम पर निर्भर नहीं है, हमें शरीर पर निर्भर होना होगा। जो भी शरीर करे उसके साथ रहना होगा उसे समर्पित होकर। इसके लिए बहुत फुर्सत चाहिए। कर्ता भोक्ता भाव से कुछ करने पाने की व्यग्रता या इच्छा इसके सर्वथा विपरीत है।ञहम शरीर के साथ रहें। शरीर बैठा हुआ है तो हम उसके साथ बैठे रहें। शरीर चल रहा है तो हम उसके साथ होकर चलें। चलना ही हो जायें। कोई दूरी न रहे। चलने वाला न रहे। अब कर्ता प्रकृति है। कर्ता अहंकार नहीं है और हम प्रकृति के साथ हैं। अब हम बहिर्मुखी तथा आक्रामक होने के बजाय स्वदेह को समर्पित है। शरीर जो कर रहा है हम करते जा रहे हैं बिना किसी दूरी,भेद,अलगाव, विमुखता के। इससे चित्त बहिर्मुखी होने के बजाय देहमुखी अंततोगत्वा आत्ममुखी होकर आत्मा से स्वयं से एकरुप हो जाता है।
यह आत्मस्थिति का बडा सरल और महत्वपूर्ण उपाय है।
यह करने जैसा है। इसकी कोशिश मात्र से आत्मविभाजन आत्मदूरी का अंत होने लगता है। अपनी तरफ मुख करने के लिए सभी सिद्धों ने कहा। मूलस्रोत भीतर ही है इसलिए।
विपश्यना में हम अपने श्वास तथा देह संवेदनाओं का निरीक्षण करते हैं। इससे चित्त आत्मा के समीप आता है।बाहर देखने से दूर जाता है। केंद्र से दूरी बढ़ती है।
परिधि पर रहने वाला दो भागों में बंट जाता है। ऊर्जा व्यर्थ संघर्ष में नष्ट होती रहती है। जो जितना अपने समीप आता है, अपने पास रहने में सफल होता है उतनी ही बड़ी ऊर्जा अनुभव में आती है। यह सच है। उपरोक्त ध्यान इसमें बडा सहायक है। मुख बोल रहा है मैं बोलने के साथ हूं। ऐसे वक्ता सुने होंगे जो बहुत जल्दी जल्दी उतावले होकर बोलते हैं।
ऐसा वक्ता भी सुने होंगे जो बहुत शांत,स्थिर,निश्चल हैं।
वे बोलने के साथ है। जैसे भीतर से कोई और बोल रहा है और वे उसे समर्पित हैं।मैं जब यह लिख रही हूं तब क्या हो रहा है? यह जो लिखना हो रहा है मेरी इसके साथ एकता है, इसमें मेरी लीनता है।यह अंतर्मुखी स्थिति है। अगर मैं बहिर्मुखी हूं,बाहर किसीको प्रभावित करना चाहती हूं तो भीतर मेरा स्रोत से संपर्क टूट जाता है। गहराई पकड में नहीं आये तब भी शरीर के साथ तो रहा ही जा सकता है। शरीर भोजन कर रहा है मैं उसके साथ हूं। नाक सांस ले रही है मैं उसके साथ हूं।ञजीभ स्वाद ले रही है मैं विमुख नहीं हूं।
कान सुन रहे हैं। मैं कानों के साथ हो गयी हूं। मैं खुद सुनना हो गयी हूं,कान ही हो गयी हूं।अपनी तरफ होकर अपने साथ रहने से देह से दूरी तो मिटती ही है लेकिन भीतर आत्मा से, ईश्वर से, मूलस्रोत से भी दूरी मिटती है।जो ईश्वर यंत्रारुढ के समान सबको घुमा रहा है उसके साथ हो गये,उसके शरण में हो गये तो परिणाम वही आयेगा जो कृष्ण ने कहा है-
'तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शांतिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।'
हमारा मुख बाहर रखकर पूछें कि हृदयस्थ ईश्वर की शरण में कैसे जाये़ तो यह नहीं होगा।जाना पूर्व में है और हम पश्चिम की ओर जा रहे हैं तो क्या होगा? या दुखी होंगे कि पैर तो पश्चिम की ओर ही बढ रहे हैं,जाना पूर्व की तरफ है? ऐसा पहले की आदत से हो सकता है। इसलिए अर्जुन मन के निग्रह को कठिन बताता है। कृष्ण कहते हैं -अभ्यास और वैराग्य से यह संभव है। सही है। अपनी तरफ आने,स्वयं से विभाजन और दूरी समाप्त करने से ज्यादा सरल और क्या हो सकता है? आत्मस्थिति ही तो स्थितप्रज्ञता है।ऐसा साधक अपने आपमें ही रहता है चौबीसों घंटे। बिना स्वयं से बाहर निकले सभी कार्य करना आश्चर्य जैसा लगता है मगर यह संभव है।ऐसे महापुरुष हुए हैं।आज भी हैं। हम भी वैसा ही होना चाहते हैं तो उपरोक्त उपाय आसान है। आंखें देख रही हैं,हम देखने के साथ होकर देख रहे हैं। न कोई कर्ता है,न भोक्ता। कान सुन रहे हैं,हम सुनने के साथ एक होकर सुन रहे हैं। पीछे कोई अहंकारविमूढात्मा शेष नहीं बचा है जो इंद्रियों के विषयों में रहे राग-द्वेष से लिप्त होकर उपद्रव करे। अच्छा। होने का अनुभव हो रहा है या नहीं स्वत:? सभी को हो रहा है। इस सहज होने वाले अस्तित्व बोध के साथ जो एक हो जाता है, इसमें लीन हो जाता है वह अहंकाररहित हो जाता है। अहंकार बहिर्मुखता में पनपता है। जैसे-जैसे साधक अंतर्मुखी होता जाता है अहंकार विलीन होता जाता है।
एक जंगल में दो शेर नहीं रह सकते इस कहावत के अनुसार अहंकार और आत्मा एक साथ नहीं हो सकते। बहिर्मुखी अवस्था में अहंकार सक्रिय हो जाता है, आत्मा खो जाता है।
अंतर्मुखी स्थिति में आत्मा प्रकट हो जाता है, अहंकार विदा हो जाता है। यह आत्मा स्व है। आत्मा में स्थित सदा स्वस्थ है।अहंकार पूर्वक जीनेवाला सदा अस्वस्थ है।वह बाहर व्यक्ति -घटना-परिस्थिति पर निर्भर है।
जो स्व में स्थित है उसमें इतनी ऊर्जा होती है जो वातावरण की नकारात्मकता बिना प्रयास के दूर कर सकती है।
विचार कीजिए दो आदमी भी झगड़ते हों तो वातावरण कैसा हो जाता है।उसे संभालना मुश्किल हो जाता है।मगर जहां लाखों योद्धा मरने मारने के लिए आतुर हैं वहां हम कृष्ण को देखकर निश्चिंत हो जाते हैं।
 हमें उनकी सामर्थ्य का पता है।उनका प्रकाश,उनका जगमगाता स्वरुप पूरे महाभारत के अंधेरे को नष्ट करने में समर्थ है।
हम भी युद्ध की विभीषिका को भूलकर आनंद से गीता का पाठ करने में संलग्न हो जाते हैं।भूल ही जाते हैं युद्ध को।
वे कृष्ण आत्मा के जीवंत सूत्र से अवगत कराते हुए संदेश देते हैं -
"स्वस्थ:।"
यह एक ही शब्द काफी है अगर यह जीवन में घट जाय।
इसकी दिशा अपनी तरफ है।
संसारी की दिशा दूसरे की तरफ है।
साधक की दिशा अपनी तरफ है।
पूर्ण सफलता नहीं मिलने तक इधर-उधर हो सकती है मगर पूरी तरह से आत्ममुखी, अंतर्मुखी होने के बाद कोई बाधा नहीं रहती।
और यही स्वयं से विभाजन और दूरी मिटाकर समर्थ बना देता है।
जब तक आदमी दो में बंटा है वह बहिर्मुखी तथा परनिर्भर होकर संघर्ष करने के लिए बाध्य है।
जहां ऐसे लोगों की भीड हो वहां सकारात्मक क्या हो सकता है?
जिसकी समझ में आये वह तो कोशिश करे।उसका दस लोगों से भी संपर्क है तो उन पर उसकी स्थितप्रज्ञता का पूर्ण प्रभाव पडेगा।

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