महाराष्ट्र और झारखंड के सबक
महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनने जा रही है जबकि झारखंड में वे चुनाव हार गए। इन चुनावों के निष्कर्ष ये हैं :
राहुल गांधी ने जातीय जनगणना और ओबीसी के लिए आरक्षण बढ़ाने की मांग को लेकर जो चक्रव्यूह भाजपा के चारों ओर बनाया था, वह भाजपा के नारे "बटेंगे तो कटेंगे" ने तोड़ दिया है! साथ ही ओबीसी के लिए आरक्षण बढ़ाने की बात ने एक बार फिर से स्वर्ण जातियों को कांग्रेस से दूर कर दिया है।
भाजपा के "बटोगे तो कटोगे" ने क्लिक किया और हिंदू बीजेपी के पक्ष में संगठित हुए।राहुल गांधी के निरंतर देश और विदेश में दिए जा रहे गैर जिम्मेदार बयानों का विपरीत असर पड़ा। इसी प्रकार महाराष्ट्र में शिवसेना के संजय राउत जी को माउथ डिसेंट्री हो गई थी,वे शिवसेना (उद्धव) का बेड़ागर्क करने में एक बड़े फैक्टर हैं।
महाराष्ट्र में कांग्रेस,शिवसेना (उद्धव) और एनसीपी (शरद पवार) का गठबंधन वैचारिक गठबंधन नहीं होने से जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता मिलकर काम नहीं कर पाए। महाराष्ट्र चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को देवेंद्र फडणवीस की छवि का पूरा लाभ मिला। हमारे देश में आरएसएस के स्वयंसेवकों की संख्या जितनी है उससे बीस गुना ज्यादा उनके वैचारिक समर्थक हैं।ऐसे में भाजपा को इस बार भी संघ के साथ का पूरा लाभ मिला।झारखंड का चुनाव कुछ अलग था, जहां आदिवासी नेता भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद रहे। वहां के आदिवासी मतदाता का संदेश है कि जब दूसरी जातियों और समुदायों के लोग राजनीति और प्रशासन में करोड़ों रुपए कमा रहे हैं ,तो हमारे एक आदिवासी नेता हेमंत सोरेन क्यों नहीं कमा सकते? लोगों ने उनके भ्रष्टाचार के बारे में सब कुछ जानते हुए भी उस पर संज्ञान नहीं लिया।
इस चुनाव में एक बार फिर महिलाओं के खाते में रुपए देने की रेवड़ी ने महाराष्ट्र झारखंड में काम किया,जो लोकतंत्र के लिए बुरा संकेत है।महाराष्ट्र में जीत और झारखंड में हार कांग्रेस के लिए संकेत है कि आपको अपनी कार्यशैली बदलनी होगी नहीं तो वे विपक्ष में या छोटे राज्यों तक सीमित रह जाएंगे।
भाजपा के लिए यह मैसेज है कि आपको जनकल्याण के लिए अभी भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।
उत्तर प्रदेश उपचुनाव में सिद्ध किया कि आज भी योगी की गुड गवर्नेंस और उनके व्यक्तित्व का आभामंडल बेमेल हैं।
कुल मिलाकर मैं इन चुनाव से को अरविंद केजरीवाल के लिए खतरे की घंटी मान रही हूं, जिस तरह भाजपा के उत्साह में वृद्धि हुई है उससे लगता है कि दिल्ली के पिच पर वह आम आदमी पार्टी को इस बार आसानी से चित कर देगी। सबक और भी हैं लेकिन नेता और राजनीतिक पार्टियां इन्हें लेने को कहां तैयार है ?
Comments
Post a Comment