सच्चे उपासक बनें
➖सच्चे उपासक बनें➖❗*
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👉 *"आत्मा" जब "परमात्मा" की गोदी में बैठता है तो उसे प्रभु की सहज करुणा और अनुकम्पा का लाभ मिलता है।* उसे तुरन्त ही निर्भयता और निश्चिन्तता की प्राप्ति होती है। हानि, घाटा, रोग, शोक, बिछोह, चिन्ता, असफलता और विरोध की विपन्न स्थितियों में भी उसे विचलित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। *उसे इन प्रतिकूलताओं में भी अपने हित-साधन का कोई विधान छिपा दिखाई पड़ता है।* वस्तुतः विपन्नता हमारी त्रुटियों का शोधन करने और पुरुषार्थ को बढ़ाने के लिए ही आती हैं। *"आलस्य" और "प्रमाद" को, अहंकार और मत्सर की मनोभूमि को हटाना ही प्रतिकूलताओं का उद्देश्य होता है।*
👉 *सच्चे "आस्तिक" को अपने प्रिय परमेश्वर पर सच्ची आस्था होती है और वह "अनुकूलताओं" की तरह "प्रतिकूलताओं" का भी खुले हृदय से स्वागत करता है।*
👉 माता मधुर मिष्ठान्न भी खिलाती है और आवश्यकता पड़ने पर कडुई दवा भी खिलाती है। दुलार से गोदी में भी उठाए फिरती है और जब आवश्यकता समझती है डाक्टर के पास सुई लगवाने या आपरेशन कराने के लिए भी ले जाती है। *माता की प्रत्येक क्रिया बालक के कल्याण के लिए ही होती है, परमात्मा की ममता जीवन के प्रति माता से भी अधिक है।* प्रतिकूलताएँ प्रस्तुत करने में उसकी उपेक्षा या निष्ठुरता नहीं, हितकामना ही छिपी रहती है।
👉 *अपनी कठिनाइयों को हल करने मात्र के लिए, अपनी सुविधाएँ बढ़ाने की लालसा मात्र से जो प्रार्थना पूजा करते हैं वे उपासना के तत्त्वज्ञान से अभी बहुत पीछे हैं।* उन्हें उन बालकों में गिना जाना चाहिये जो प्रसाद के लालच से मन्दिर जाया करते हैं। *ऐसे बच्चे वह आनन्द कहाँ पाते हैं जो भक्तिरस में निमग्न एक भावनाशील आस्तिक को प्रभु के सम्मुख हृदय खोलने और मस्तक झुकाने में आता है।* प्रभु के चरणों पर अपनी अन्तरात्मा को अर्पण करने वाले भावविभोर भक्त और प्रसाद की मिठाई लेने के उद्देश्य में खड़े हुए भिखमंगे में जो अन्तर होता है वही सच्चे और झूठे उपासकों में होता है। *एक का उद्देश्य "परमार्थ" है दूसरे का "स्वार्थ"*। स्वार्थी को कहीं भी सम्मान नहीं मिलता। *परमात्मा की दृष्टि में भी ऐसे लोगों का क्या कुछ मूल्य होगा ?*
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