हमें जड़ो की ओर लौटना होगा

गोआ की तुलना भी जो थाईलैंड से कर कहते हैं कि गोवा में महंगाई हो गयी है, ऊपर से ढंका इंफ्रा नही है, इन शार्ट पैसा वसूल नही होता, वो इस तरह शिकायत करते करते किसी थाईलैंड या वियतनाम से तुलना करने लगते हैं।

पहली बात कि आप एक छोटे से राज्य 40 बाई 45 किलोमीटर गोवा की तुलना थाईलैंड या वियतनाम जैसे देश से कर रहे हो।
फिर यदि आप संख्या निकालोगे तो थाईलैंड में लोग कई वजह से जा रहे होंगे जबकि गोवा में ले देकर बीच की वजह से, तो गोवा की संख्या कम दिखेगी।फिर भी इतनी कम नही होती क्योंकि तुलना दूसरे देश से हो रही है।

फिर आप कॉस्ट पर आ जाते हो,तो कॉस्ट का सीधा फंडा है कि आपके पास पैसा कितना है?जैसे कोई तेल प्रोड्यूस कंट्री है और उसको बस तेल बेचना है और डॉलर आ रहे तो वो टैक्स बिल्कुल कम रख भी देश को मस्त चला सकता है और उसके देश मे महंगाई भी न होगी क्योंकि उससे ज्यादा उसके पास पैसे हैं।इसी तरह क्या किसी थाईलैंड या वियतनाम के पास सफिसिएंट पैसा है?इतना कि अगर वो कॉस्ट कटिंग करता है तो भी उसे पैसे की दिक्कत नही आएगी?यदि है तो उसे सस्ता होने में समस्या नही होगी।

इसी तरह थाईलैंड या वियतनाम की इकोनॉमी का मॉडल क्या है?
क्या वो टूरिज्म है?
वहीं गोवा का क्या है?
उसका भी टूरिज्म है?
लेकिन गोवा अपने मे किसी मालद्वीप की तरह देश तो नही?
वो भारत से जुड़ा है जो टूरिज्म बेस इकोनॉमी नही है।और भारत जो भी तरह की इकोनॉमी है, उसमें कॉस्ट कितनी है?
क्योंकि यदि किसी गोवा को अपना इंफ्रा बेहतर करना है तो उसे उसी कॉस्ट पर चीजें खरीदनी होंगी जिस कॉस्ट पर भारत के अन्य जगह मिलती हैं और यदि वो महंगी हैं तो वो सस्ते में नही कर सकता।

इसमें ये कहा जा सकता है कि सस्ता करने से ज्यादा आएंगे तो वहां से भरपाई हो जाएगी, तो बात तो घूम फिरकर वही आ गयी कि जब पहले जितनों के लिए ही अभी बेहतर इंफ्रा नही तो और ज्यादा के लिए कैसे बनेगा?और ज्यादा बुलाने से पहले उतनो के लिए इंफ्रा तैयार करना होगा जिसके लिए एडवांस में पैसा चाहिए और वो महंगा है।

ऊपर से गोवा जैसा बगल में मालद्वीप है। थाईलैंड या वियतनाम या अन्य देश भी हैं। ये सब बीच, रिसोर्ट जैसे टूरिज्म पर बेस्ड हैं, तो ऑप्शन हमेशा खुले रहते हैं क्योंकि ऐसा नही होता कि आज जो 10 लाख आये, कल दूसरे 10 लाख और परसो तीसरे 10 लाख आएंगे।बहुत से रिपीट होते हैं और ऐसे में वो कहते हैं कि गोवा देख लिया, अब कुछ और देखते हैं।
और ऐसा भी नही कि हर बार नए नए ही आते रहेंगे क्योंकि दुनिया के किसी भी देश के नागरिकों के पास इतना पैसा नही कि उसका हर नागरिक वर्ल्ड टूर कर सके। ये लिमिटेड लोग ही होते हैं जो कभी इस देश तो कभी उस देश जाते हैं।

लेकिन टूरिज्म की ही बात करें तो भी भारत का टूरिज्म ये गोवा भर नही है और न भारत को ये टूरिज्म चाहिए।भारत का टूरिज्म उसकी पहचान के साथ जुड़ा होना चाहिए नाकि किसी वेस्ट की नकल जो अपने देश मे भी समुद्र किनारे बिकिनी में लेटी है और भारत आकर भी वही कर रही।ऐसे में क्या यूनिक हुआ हमारा टूरिज्म?और जो फिर भी ऐसा कर रहे, उन्हें यही मुबारक।

हालांकि, हमारा टूरिज्म इतिहास से जुड़ा होना चाहिए, अध्यात्म से जुड़ा होना चाहिए, विभिन्न नेचर और लैंडस्केप से जुड़ा होना चाहिए, विभिन्न मौसमों से जुड़े पर्यटन से जुड़ा होना चाहिए और इन सबसे बड़ा कि हमारे मन्दिर, हमारे पूजनीय स्थलों, सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ा होना चाहिए।

क्योंकि ये ही हमारी पहचान है।और जब हम इस ओर देखते हैं तो पता चलता है कि ले देकर मंदिरों के कुछ कॉरिडोर भी अब इस सरकार ने बनाये हैं।वरना पहले हिन्दू ही धक्के खाकर अपने मंदिरों तक पहुंचता था या जो ताजमहल बेचा जाता था उसके आस पास क्या हाल है, वो गूगल कर सकते हो।
और फिर हम उनसे तुलना कर रहे जो कई दशक पहले से इस तैयारी में जुट गए थे कि उन्हें टूरिज्म इकोनॉमी बनना है और जो उनके पास है, उसके माध्यम से दुनिया को आकर्षित करना है।

हम यूरोप में भी लन्दन, पेरिस आदि की बात करते हैं लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यूरोप के अधिकतर देशों में उनका टूरिज्म उनकी कैपिटल सिटी बेस्ड ही है अर्थात सबसे ज्यादा इन कैपिटल सिटी में ही आते हैं।स्विजरलैंड जैसों ने भी टूरिज्म कब विकसित कर लिया था वो आप 1960-70 के दशक में बॉलीवुड की फिल्मों में देख सकते हो।

हमारे यहां भी किसी डल झील पर फ़िल्म शूट होती थी लेकिन फ़ोटो उठाकर देखो कि जिस डल झील पर शर्मिला टैगोर कश्मीरी कली बनकर बोट में घूमती थी, वहां कुछ दशक में ही जिहादी बुर्के वाली नागफनियाँ आ गयी।

हमने तो अपने पर्यटन स्थलों को कनेक्ट करने को न ट्रेन और न सड़क का जाल बनाया। नार्थ ईस्ट को उग्रवादियों के हवाले कर दिया जहां इतना सौंदर्य है। बिहार "भूरा बाल साफ करो" में लगा रहा जहां इतना कुछ प्राचीन विरासत है। UP दंगा प्रदेश बन गया जहाँ अब जाकर राम मंदिर बन रहा है। उत्तराखंड की ऑल वेदर रोड़ अब बन रही है। हिमांचल में टूरिज्म है लेकिन उससे ज्यादा पर्यटक हो जाते हैं क्योंकि उसकी कैपिसिटी अब ओवर हो चुकी है। पंजाब में गोल्डन टेंपल के नाम पर टूरिज्म हो रहा है बस, जिस वजह से जाने वाले अटारी तक चले जाते हैं या जलियांवाला घूम आते हैं। राजस्थान में पैलेस टूरिज्म ठीक ठाक चल लेता है। गुजरात मे भी सफेद रेगिस्तान, गिर नेशनल पार्क या अब स्टैच्यू ऑफ यूनिटी है। महाराष्ट्र में कुछ ही जगह है बाकी मेगा सिटी तो विदेशियों ने अपने देश मे देखी है। साउथ में भी ऐसा ही है, ज्यादा मुझे उधर का पता नही, बस मंदिरों का पता है या हाउस बोट का, शायद झरने भी हैं। मध्यप्रदेश में भी मुझे खास पता नही लेकिन अब हमारे इधर से महाकाल कॉरिडोर जाते हैं। उड़ीसा, बंगाल में भी क्या क्या है, पता नहीं। लक्षद्वीप में अब मालद्वीप को टक्कर देने की शुरुआत करने की कोशिश की है। अंडमान भी कुछ इस तरह है लेकिन कितना, पता नही।

तो इतना कुछ कहने का मतलब है कि हमने कभी टूरिज्म इकोनॉमी पर ध्यान ही न दिया। अब जरूर सरकार कह रही कि अगर सफल हुए तो 10 करोड़ रोजगार ये टूरिज्म ही अकेले कर लेगी और किसी दिन 1 ट्रिलियन तक भी इससे कमाई हुआ करेगी लेकिन इसे बनाने में अब शुरू किया है तो भी 2-3 दशक लग ही जायेंगे।ऊपर से यदि लॉ एंड ऑर्डर सही रहा वरना अब तो लोग लण्डन, पेरिस जाने में भी डर रहे, कारण आपको पता हैं।

इसलिए टूरिज्म हमें अपने हिसाब का डेवलप करना है।
पुराने समय मे हमारे विश्विद्यालय, गुरुकुल, मन्दिर, आध्यात्मिक केंद्र, सांकृतिक केंद्र आदि ही हमारी पहचान थी जिससे दुनिया यहां आती थी और हमें इन सबसे विश्वगुरु की उपाधि मिली हुई थी।और ये वापिस चाहिए तो फिर हमें जड़ो की ओर लौटना होगा वरना ये बड़ी बड़ी बिल्डिंग्स, बीच, जैसी चीज दुनिया के पास पहले से है, तो वो क्यो आएगा सेम चीज देखने अपना पैसा खर्च कर, जब तक उसे ऐसा न लगे कि भारत मे उपरोक्त चीजों के लिए जाना है, लगे हाथ एक दो दिन किसी बीच पर भी गुजार लेंगे।

Comments

Popular posts from this blog

1972 पर इंदिरा गांधी की प्रतिक्रिया व विचार क्या रहे अवश्य ही जाने

बात कड़वी है मगर सच्ची है

मै कहना चाहूंगी कि