इस मुद्दे पर अब तक किसी ने बात नही की
अमरीका ने जब रूस के 300 अरब डॉलर सीज किये तो इसने इस बात की ओर सबका ध्यान दिलाया कि किस तरह डॉलर रखना मुसीबत के समय घातक है, खासकर यदि आप अदृश्य राज्य के हिसाब से नही चल रहे।रूस के पास करीब 600 बिलियन का फोरेक्स रिजर्व था जिसमें से आधा डॉलर/यूरो में था जिसे सीज कर दिया गया। बाकी का उसका युआन/रुपये जैसी मुद्रा और सोने और बांड्स और अन्य चीजों में है।
चूंकि सबको डॉलर में ही गिना जाता है आसान बनाने को, तो बताया जाता है कि फोरेक्स रिजर्व 600 बिलियन डॉलर है।
भारत के पास भी 650 बिलियन डॉलर का फोरेक्स है।
हालांकि भारत ये नही बताता कि उसमें से डॉलर/यूरो कितना है लेकिन माना जाता है या IMF जैसे दावा करते हैं कि वो करीब 80% अर्थात 520 अरब डॉलर/यूरो है।पुनः स्पष्ट कर दूं कि माना जाता है क्योंकि कोई आंकड़े रिजर्व बैंक जारी नही करता है ऐसे।
लेकिन जब वेस्ट ने अपनी औकात दिखाते हुए रूस के 300 बिलियन डॉलर/यूरो सीज कर दिए तो जाहिर है सबके दिमाग की घण्टी बजी होगी और मैं ये मान सकता हूँ कि भारत, चीन, रूस जैसे देशों ने इसपर बात भी की होगी, खासकर ब्रिक्स में 100% इसपर बात हुई होगी।तो जैसा कि मैं बता रहा था कि माना जाता है कि भारत के पास 520 बिलियन तक डॉलर/यूरो है लेकिन ये आधिकारिक आंकड़ा इसलिए नही है कि भारत या अन्य देश इसका खुलासा इसलिए नही करते कि वो ये नही बताना चाहते कि क्या हम अपनी डॉलर में डिपेंडेंसी कम कर रहे या नहीं क्योंकि फिर अमरीका जैसे जाहिर है इसका बदला लेंगे।
लेकिन जैसे जयशंकर जी कहते हैं कि ब्रिक्स एन्टी वेस्ट नही है, नॉन वेस्ट है, जिसे पढा जाना चाहिए कि हम नॉन वेस्ट नही, एन्टी वेस्ट बन रहे हैं तो इसपर काम भी हो रहा होगा।तो इसी तरह के काम की पुष्टि के लिए आपको एक दूसरी खबर की याद दिलाना चाहूंगा कि जहां भारत ने अपना 200 टन से ज्यादा सोना भारत मंगा लिया जो बैंक ऑफ इंग्लैंड जैसे अदृश्य राज्य के बैंक में जमा था।इसपर एक पोस्ट तब लिखी थी कैसे हमारा सोना दुश्मन के यहां जमा होना हमारे लिए खतरा है जैसा रूस के साथ हुआ उसके डॉलर के समय।तो जैसे भारत अब अपना सोना वापिस मंगा रहा है क्योंकि ये मुद्राएं तो आज हैं, कल नही लेकिन वो सोना ही है जो युगों से एक विश्वसनीय मुद्रा रहा है तो जरूरी है कि हमारा सोना हमारे पास रहे। वैसे भी भारत के पास इन्ही वेस्ट की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया का 11% सोना है जिसमें से सबसे ज्यादा हमारे मंदिरों और महिलाओं के पास है तो इसका कैलकुलेशन आप कर सकते हो।
और ये भी याद दिला दू कि जब डॉलर को विदेशी मुद्रा 1944 में स्वीकार किया जा रहा था जब ये अदृश्य राज्य वाले यूरोप छोड़ अमरीका शिफ्ट हो रहे थे जहां ये न्यू वर्ल्ड आर्डर के तहत IMF, वर्ल्ड बैंक, UN आदि बना रहे थे तो तब इसी बात का भरोसा दिया गया था कि आप अपना सोना हमारे पास गिरवी रख दो और बदले में उतना डॉलर ले लो लेकिन फिरv दुनिया(फ्रांस जैसा इनका दोस्त) भर को धोखा देकर कहा गया कि जो सोना था वो हमने जब्त कर लिया और अब डॉलर ऐसे ही छपेगा बिना किसी बैकिंग के और जो न लेगा वो हमारे दुश्मन बनेगा।और बाद में तो खैर 1974 में इसे पेट्रोडॉलर में बदल दिया गया जब वेस्ट एशिया समेत OPEC को डराकर ये कह दिया कि अब से अपना आयल एंड गैस तुम डॉलर में ही बेचोगे(चूंकि दोनों चीज हर देश को चाहिए थी/है) और बदले में हम तुम्हे सेफ्टी देंगे(इज्जरैल से जो इन्होंने ही बनवाया) वरना फिर तुम तुम्हारे हवाले अर्थात इज्जरैल से तुम्हे भिड़ाएंगे।और अभी हाल में पेट्रो डॉलर के 50 साल का करार पूरा हुआ है जिसे अब MBS ने आगे बढाने से मना कर दिया है जो खुद ब्रिक्स जॉइन करना चाहता है लेकिन ऊपर वेस्ट भारी दबाव बना रहा है।और डॉलर कैसे खेल करता है तो इसका ऐसा है कि आपके फोरेक्स रिजर्व का डॉलर आपके पास नही होता(शायद कोई भी करंसी नही) और ये डॉलर अमरीकी बैंकों में जमा रहता है जहां आपका सेंट्रल बैंक(RBI) अपना खाता खोलता है और वहां उस डॉलर को जमा रखता है।
फिर जब आप व्यापार करते हैं तो जैसे हमारा UPI है, ऐसा ही एक पेमेंट गेटवे सिस्टम होता है जिसे स्विफ्ट कहते हैं।
फिर जब आपको कुछ भी खरीदना होता है तो आप किसी देश के साथ सौदा करते हैं। फिर जब वहां से आप आयात करते हैं तो फिर अमरीकी बैंक जहां आपके डॉलर जमा हैं वहां से आप पेमेंट करवाते हैं।और जैसे हम जब कुछ ख़रीदते हैं और UPI की मदद से पेमेंट करते हैं इसी तरह जब डॉलर की पेमेंट उस निर्यातक देश को जाती है तो इसी पेमेंट गेटवे से जाती है जिसे स्विफ्ट कहते हैं और इस तरह अमरीका को पता होता है कि कोई भी देश क्या खरीद रहा और क्या बेच रहा, यहां तक कि किस रेट पर खरीद रहा और बेच रहा, जिस वजह से अमरीका चाहे तो ये आदेश किसी देश को दे सकता है कि तुम किसी देश को इतना सस्ता नही दे सकते या किसी देश को जानकर महंगा बेचो, अर्थात प्राइस कंट्रोल वाली ब्लैकमेलिंग उसी के पास होती है।
इसी वजह से जब हम रूस से तेल खरीदते हैं तो एक तो अमरीका डॉलर में पेमेंट करने से बैन किया है लेकिन जब हम रुपये जैसे माध्यम से तेल खरीद रहे तो उसको पता ही नही है कि हम ये तेल कितने में खरीद रहे या जो इसके बदले रूस खरीद रहा है वो किस दाम में है या ये तक नही पता कि आखिर किस किस चीज का सौदा हो रहा है।(हां उसकी इंटेलिजेंस कुछ हद तक पता या अनुमान लगा सकती है या हम ही ऐसे ही खुद को ट्रांसपेरेंट "दिखाने" को बता सकते हैं कि हमने इतना इतना तेल खरीदा या बेचा क्योंकि सरकार में ट्रांसपरेंसी होती है जिसे CAG मॉनिटर करता है, लेकिन ये जरूरी नही कि हम सब कुछ बता रहे हैं जो स्विफ्ट के चक्कर मे बिना बताए ही अमरीका को पता चल जाता है)तो कुलमिलाकर कहना ये है कि डॉलर की जो हेजेमनी(गुंडागर्दी) है वो बड़ी खतरनाक है और जिस तरह भारत अपना सोना वापिस ला रहा अदृश्य राज्य के बैंकों से, उसी तरह मुझे विश्वास है कि जो ये माना जाता है कि 650 बिलियन में से 520 बिलियन डॉलर/यूरो में है, भारत इसको भी कम करने का प्लान कर रहा होगा।
लेकिन ये बात बाहर नही आएगी। हालांकि, यदि अमरीकी बैंकों में अब पहले से कम डॉलर डिपॉजिट अमरीका को दिख रहे होंगे तो उन्हें समझ आ रहा होगा और ये भी अमरीका(अदृश्य राज्य) के चिढ़ने की एक वजह बन रही होगी जिस वजह से वो भारत से दुश्मनी ले रखा है।और ये लेख इसीलिए है क्योंकि इस मुद्दे पर अब तक किसी ने बात नही की है।
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