जानिये क्यों कहा जाता है कि इस मंदिर में भगवान नरसिंह की प्रतिमा जीवित है, आखिर क्या है इस मंदिर का रहस्य*
नरसिंह, भगवान विष्णु के चौथे अवतार हैं, जिन्होंने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए यह रूप धारण किया था। वैसे तो भारत के कुछ जगहों पर ही भगवान् नरसिंह का मंदिर स्थापित है लेकिन तेलंगाना में वारंगल शहर के मध्य में स्थित मल्लूर में नरसिम्हा स्वामी मंदिर है, जिसमें स्थापित नरसिम्हा देव की मूर्ति जीवित मानी जाती है यानि इस मंदिर में भगवान नरसिंह की प्रतिमा को जीवित मानकर उनकी पूजा की जाती है। इस मंदिर को लेकर लोगों में यह आस्था है कि इस मंदिर की प्रतिमा में दिव्य ऊर्जा का वास है। प्रतिमा की आंखें और मुखमंडल में अद्वितीय चमक और ऊर्जा का आभास होता है और त्वचा जीवित इंसानों जैसी लगती है। मूर्ति की खासियत है कि मूर्ति 10 फीट तक ऊंचा है और मूर्ति का पेट मानव त्वचा के समान मुलायम है। इसलिए, लोगों को यह मूर्ति जीवित महसूस होती है। उन्हें लगता है कि भगवान् साक्षात उनके सामने खड़े हैं। मान्यता यह भी है कि अगर आप मूर्ति को दबाते हैं, तो उसकी त्वचा पर एक गड्ढा बन जाता है और कई बार तो उसमें से खून निकलने लगता है। इसलिए वहाँ के पुजारी लगातार भगवान नरसिंह की मूर्ति पर चंदन का लेप लगाते हैं ताकि खून बहना बंद हो जाए।
नरसिंह की जीवित प्रतिमा वाले इस मंदिर में आने वाले भक्तों को मान्यता है कि भगवान नरसिंह उनकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं और उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं। भक्तों के अनुभव और चमत्कारों की कहानियाँ इस मंदिर की महत्ता को और बढ़ा देती हैं। भक्तों का मानना है कि प्रतिमा में भगवान नरसिंह की जीवित उपस्थिति है और वे अपने भक्तों की प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं। कई भक्तों का दावा है कि उन्होंने प्रतिमा में कई दिव्य चीजें होते देखी हैं और यहाँ उनकी प्रार्थनाओं का तुरंत उत्तर मिला है। यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए एक अद्वितीय और दिव्य अनुभव का केंद्र है।
देशभर से पर्यटक नरसिंह भगवान की जीवित प्रतिमा के दर्शन के लिए लंबी यात्राएं करते हैं। मुख्य मंदिर तक पहुँचने के लिए लगभग 150 सीढियां चढ़नी पड़ती है, लेकिन भक्तों को इसमें अत्यंत आनंद और शांति का अनुभव होता है। इस मंदिर की यात्रा और यहां के दर्शन से भक्तों को आत्मिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान नरसिंह का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मंदिर में स्थापित भगवान् नरसिम्हा की मूर्ति को देखते ही लोग मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
मंदिर की संरचना स्थापत्य शैलियों का मिश्रण है और मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार पारंपरिक गोपुरम जैसा दिखता है, लेकिन इसका शिखर दक्षिण भारतीय वास्तुकला की प्रमुख शैली के समान है। मंदिर की दीवारें देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियों, पौराणिक पात्रों और अन्य जटिल नक्काशी से सजी हैं। वार्षिक ब्रह्मोत्सवम उत्सव के दौरान, इस मंदिर से देवताओं का एक भव्य जुलूस निकाला जाता है।
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