अभ्यास और विवेचन
|| ॐश्रीपरमात्मनेनमः||
* अभ्याससे अप्राप्तकी प्राप्ति होती है और विवेचनसे नित्यप्राप्तकी प्राप्ति होती है | अतः अभ्यास सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिमें काम आता है और विवेचन परमात्मतत्त्वकी खोजमें काम आता है |
यद्यपि विवेचनके बिना अभ्यास नहीं होता, तथापि केवल विवेचनसे वस्तुकी प्राप्ति नहीं होती | जैसे, तबला बजाना सीखते हैं तो पहले उसका विवेचन करते हैं, बोल सीखते हैं, फिर उसका अभ्यास करते हैं |
केवल विवेचन करनेसे मनुष्य बोल तो सीख जाता है, पर तबला नहीं बजा सकता | परन्तु केवल विवेचन करनेसे मनुष्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकता है |
* अभ्याससे नींद आती है और विवेचनसे नींद उड़ जाती है | कारण कि जितना अधिक अभ्यास करते हैं, उतनी ही थकावट आती है और विवेचनमें जितना गहरा उतरते हैं, उतनी ही थकावट दूर होती है तथा बुद्धि में स्वच्छता आती है
अभ्याससे एक नयी अवस्थाका निर्माण होता है और विवेचनसे अवस्थातीत तत्त्वका अनुभव होता है |
नारायण! नारायण!! नारायण!!!
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