इन्सान का मन एक मगरमच्छ की भांति है कैसे ?

इन्सान का मन एक मगरमच्छ की भांति है कैसे ?
आइए गजेंद्र मोक्ष के प्रसंग से जानते हैं ... 

जिस प्रकार गजेंद्र के पैर को मगरमच्छ ने पकड़ लिया था, उसी प्रकार कई बार हमारी चेतना मगरमच्छ जैसे विचारों के चंगुल में फस जाती है जो हमें कभी नहीं छोड़ती!  

विशेष रूप से बहुत ही विकट परिस्थितियों के दौरान हमारा मन परेशानी पैदा करता है और आसान व संभव कार्य भी असंभव महसूस होने लगते हैं। इसी कारण हमारा यह उद्वेगी मन हमारी चेतना को बहुत तंग करता है और हमें पूरी तरह से निराश कर देता है।  

हम कितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन हमारा मन बार-बार वही सोचता रहता है जो उसे नहीं सोचना चाहिए। स्थिति के इर्द-गिर्द का दर्द और अनिश्चितता हमारे हृदय में ऐसे गहरी उतर जाती है जैसे मगरमच्छ के जबड़ों में गजेंद्र का पैर !

पलायन क्या है?
गजेंद्र ने एक हजार दिव्य वर्षों तक मगरमच्छ से स्वयं को छुड़ाने की कोशिश की लेकिन अनेकानेक प्रयासों के बावजूद भी और अपने परिवार के सदस्यों की मदद से भी वह उस मगरमच्छ के चंगुल से नहीं बच पाया।  

जब उसे यह समझ आई कि वह अपने बल सहित, कोई भी उसकी सहायता नहीं कर सकता, तब गजेंद्र ने अपनी अंतरात्मा से भगवान की प्रार्थना की और एक कमल भगवान के चरणों में अर्पित कर प्रभु की शरण ली। शीघ्र ही भगवान गरुड़ पर प्रकट हुए और सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का गला काटकर गजेंद्र को मुक्त कर दिया।

इसी तरह, हमारे अपने प्रयासों से, हम अपने मन के चुंगल से नहीं निकल सकते। भगवान का पावन नाम ही हमारा एक मात्र सहारा है। नाम और नामी अभिन्न होने के कारण, दोनो हमें मन के चक्रव्यूह से बाहर निकालने की शक्ति रखते हैं।

"मंत्र" शब्द का अर्थ ही यही है - "मनस् त्रायते इति मंत्र" - जो मन से मुक्त कराए।

इस प्रकार जब हम असहाय भाव से भगवान को बुलाते हैं या जाप करते हैं 

*हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे*

तब गजेंद्र की तरह, हम अपने मन की खींचा-तानी से पूर्ण रूप से स्वतंत्रता, यानी उसके चुंगल से बचने का अनुभव कर सकते हैं।

*🦚🌹//हरे कृष्ण\\🌹🦚*

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