li.दयावान-क्रांतिकारी-दालाबेहरा

आज से लगभग दो सौ वर्ष पहले अंग्रेज़ों की गुलामी झेल रहे उड़ीसा वासियों पर खूब अत्याचार हो रहे थे। सदियों से जिन प्राकृतिक संसाधनों से लोग अपना जीवन चला रहे थे, वे अब ब्रिटिश शासकों द्वारा नियंत्रण में लिए जा चुके थे। अपनी ही भूमि पर खेती करने के लिए लोगों को कर चुकाना पड़ता था। यहां तक कि ये लोग जंगल से लकड़ी भी नहीं काट सकते थे। अपनी पैदावार का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ों को दिए बिना वे इसे बेच नहीं सकते थे। उनके कठोर नियम लोगों पर बलपूर्वक थोपे जाते थे। विरोध करने वाले को कड़ी सज़ा भी भुगतनी पड़ती थी।

वहीं नारनागढ़ गांव में एक बहादुर और उदार व्यक्ति रहता था। उसका नाम था-दालाबेहरा। वह गांव का प्रधान था और काफी गुणवान होने के कारण उसका बड़ा नाम था। अपने गांव में ही नहीं, बल्कि आस-पास के गांवों में भी सब उसका आदर करते थे। ऐसा कहा जाता था कि ज़रूरत पड़ने पर जो भी दालाबेहरा के पास गया, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटा।

ब्रिटिश शासकों के अत्याचार जब असहनीय हो गए तब लोग अपने दुखड़े लेकर दालाबेहरा के पास पहुंचने लगे। “दालाबेहरा, अब आप ही उद्धार करो। हम और नहीं झेल सकते। लगता है कि अपने खेतों में हम कमरतोड़ परिश्रम अपने और अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि उस निर्दयी सरकार के लिए कर रहे हैं," लोग गुहार लगाने लगे।

दालाबेहरा को आए दिन ऐसी कहानियां सुनने को मिलतीं। और फिर उसने सोच लिया, कुछ तो करना ही पड़ेगा। उसने अपने आदमियों को आस-पास के गांवों में यह संदेश भेजने का आदेश दिया कि सभी युवा कल शाम नारनागढ़ के चौक में इकट्ठे हों।

अगले दिन हज़ारों की संख्या में युवा चौक में जमा हो गए। युवकों का जोश देखकर दालाबेहरा खुश था। वह बोला, “हम में इतना जज़्बा है कि हम क्रूर अंग्रेज़ों से टक्कर ले सकें। सबसे पहले हमें उन्हें 'सरकार' बोलना बंद करना होगा। हमारे केवल एक ही सरकार हैं और वे हैं स्वयं भगवान जगन्नाथ। अंग्रेज़ हमारी भूमि पर व्यापारी बनकर आए थे। हमारे विशाल हृदय और सीधेपन का लाभ उठाकर वे हमारे राजा बन बैठे।"
"लेकिन दालाबेहरा, ये तो बताओ कि हम उनसे कैसे लड़ सकते हैं? उनके पास इतनी बड़ी सेना और तोपखाने हैं," वहीं खड़े युवक ने पूछा।

"बिलकुल सही कहा, उनके पास सब कुछ है, पर हमारे पास भी उनसे लड़ने की इच्छाशक्ति और दृढ़ विश्वास है। उनके गुलाम बनकर रहने से तो सिर उठाकर मिली मौत कहीं अच्छी होगी। क्या आप मेरा साथ दोगे, जवाब दीजिए?" उसने पूछा। "हां, हम तैयार हैं," सबने हुंकार भरी।

वहां उपस्थित युवाओं में से कई तो पूर्व राजा के सैनिक रह चुके थे। उन्हें 'पाइकास' कहा जाता था। दालाबेहरा ने पाइकास के साथ मिलकर एक युद्ध परिषद् का गठन किया और अंग्रेज़ों पर हमले की रणनीति तैयार की। शुरुआत में कुछ लड़ाईयां शेर-दिल दालाबेहरा और उसके योद्धाओं ने जीतीं। उन्होंने दुश्मनों के कई ठिकानों को अपने कब्जे में कर लिया।

इन झटकों को झेल लेने के बाद अंग्रेजों ने बदला लेने के लिए देश के अन्य हिस्सों से अंग्रेज़ टुकडियां बुलवा लीं। कई सैन्य उपकरणों-हथियारों का प्रयोग कर ब्रिटिश सैनिकों ने उन देशभक्तों पर ताबड़-तोड़ हमले करने शुरू कर दिए। परिणामस्वरूप कई क्रांतिकारी मारे गए और कई घायल हुए। कइयों को धर-दबोचा गया। किसी तरह से दालाबेहरा अपने साथियों के साथ भाग निकलने में सफल हो गए। छिपकर भी उसने अंग्रेजों के विरुद्ध षड़यंत्र रचने जारी रखे। पकड़े गए सैनिकों को अंग्रेज़ों ने या तो फांसी पर लटका दिया या फिर जेलों में भरकर क्रूर यातानाएं देते रहे। क्रांतिकारियों के विद्रोह का करारा जवाब देने के लिए अंग्रेजों की टुकड़ी के प्रमुख अफसर को किसी भी कीमत पर दालाबेहरा का सिर चाहिए था। परंतु साथी क्रांतिकारियों के मुंह से वह दालाबेहरा का पता-ठिकाना नहीं निकलवा सका। आखिरकार अंग्रेज़ अफसर ने दालाबेहरा को जीवित या मृत पकड़वाने वाले को एक हजार रुपए का पुरस्कार देने की घोषणा की।

इस बीच दालाबेहरा के सभी साथी मारे जा चुके थे। वह अकेला जंगलों में भूखा-प्यासा छिपता फिर रहा था। दालाबेहरा आज़ाद था, लेकिन अंग्रेज़ों से आज़ादी पाने का उसका सपना अब टूट चुका था।

एक दिन दालाबेहरा जंगल में भटक रहा था। तभी उसकी नज़र वहां से गुज़र रहे एक व्यक्ति पर पड़ी। दालाबेहरा तुरंत अपने बचाव के लिए तैयार हो गया, लेकिन बाद में उसने देखा कि वह व्यक्ति काफी परेशान लग रहा था। दालाबेहरा ने उसका रास्ता रोक दिया। उसे देखते ही व्यक्ति ने पूछा,
"अरे भाई! नारनागढ़ कौन-सा रास्ता जाता है?"
"कौन रहता है तुम्हारा वहां?" दालाबेहरा ने पूछा। "कोई नहीं, मैं दालाबेहरा से मिलने जा रहा हूं," व्यक्ति ने जवाब दिया।

अपने सामने खड़े दालाबेहरा को वह पहचान न सका था। उसके बाल बढ़े हुए थे, दाढ़ी बिखरी हुई थी और कपड़े फटे पड़े थे। क्रांतिकारी बन चुका दालाबेहरा अब बिलकुल भी पहचान में नहीं आता था। "क्या करोगे उससे मिलकर?" दालाबेहरा ने पूछा। "मेरा नाम जगत पांडा है। मैं गंजम का रहने वाला ह। गांव छोडकर मैं कहीं और रहने जा रहा था। मेरे परिवारवाले मुझसे पहले ही जा चुके हैं।

नाव में घर का सामान रखवाकर मैं अपनी मंज़िल की तरफ जा रहा था कि नाव उलट गई और सारा सामान नदी में बह गया। मेरे पास सिर्फ यही कपड़े रह गए हैं, जो मैंने पहने हुए हैं। मेरा इतना बड़ा परिवार है, अब उसका क्या होगा?" "लेकिन ये बताओ कि इसमें दालाबेहरा क्या करेगा?"
जगत हैरानी से बोला, “लगता है तुम जानते नहीं। सुना है कि वह बड़ा महान है। उसके सामने फरियाद करने वाले की मदद ज़रूर की जाती है।"
जगत का दुख और श्रद्धा को देखकर दालाबेहरा भाव-विभोर हो उठा। वह मन-ही-मन सोचने लगा, 'अरे भाई, काश तुम्हें पता होता कि जिस दालाबेहरा के पास तुम सहायता के लिए जा रहे हो, आज वह स्वयं भूखों मर रहा है। वह किसी की क्या मदद करेगा।'

चुप्पी तोड़कर दालाबेहरा जगत से बोला, "मैं उसे जानता हूं। चलो, मैं तुम्हें उसके पास ले चलता हूं। आजकल वह खुर्दा में रहता है।"
दालाबेहरा जगत को सीधे ब्रिटिश अफसर के पास लेकर पहुंच गया। वह खुर्दा की छावनी में रह रहा था। अफसर दालाबेहरा को पहचान न सका और बोला, "कौन हो तुम और यहां क्यों आए हो?"
"मैंने सुना है कि दालाबेहरा को जीवित या मृत पकड़वाने वाले को तुम एक हज़ार रुपए नगद देने वाले हो। क्या यह सच है?"
"हां, यह बिलकुल सच है। बोलो, तुम्हें पता है वह कहां है? जब तक उसे गिरफ्तार नहीं कर लूंगा, तब तक मैं चैन से नहीं बैठ सकता।"

दालाबेहरा अंग्रेज़ अफसर की आंखों-में-आंखें डालकर दहाड़ा, "देख मुझे, मैं हूं दालाबेहरा। देख, मैं तेरे सामने खड़ा हूं। मैं हूं वो जिसने तेरी नींद उड़ा रखी है। बिलकुल निहत्था हूं। मुझे गिरफ्तार कर और इस भले आदमी को एक हजार रुपए दे दे।"
"क्याऽऽ... क्या कहा तुमने? तुम हो दालाबेहरा! विश्वास नहीं होता। डरकर इस तरह आत्मसमर्पण करोगे, सोचा नहीं था।"

दालाबेहरा ने उसे जगत के साथ हुए हादसे की पूरी कहानी कह सुनाई और फिर वह बोला, “इस बेसहारा व्यक्ति पर बहुत बड़ी मुसीबत आन पड़ी है। मैं इसकी खुशी के लिए अपनी आज़ादी का सौदा कर रहा हूं।"

कुछ देर स्तब्ध रहने के बाद अफसर बोला, "दालाबेहरा, तुम एक बहुत बड़े क्रांतिकारी हो यह तो मुझे पता था, लेकिन तुम एक दयावान मनुष्य भी हो, यह मुझे आज पता चला। तुम्हारे इस साहस और त्याग के सामने प्रतिशोध की मेरी तुच्छ भावना कहीं स्थान नहीं पाती। हे पराक्रमी महानुभाव, मैं इसे एक हज़ार रुपए और तुम्हें तुम्हारी आज़ादी देता हूं!"
इन्हीं शब्दों के साथ अंग्रेज़ अफसर ने स्वतंत्रता सेनानी दालाबेहरा से हाथ मिला लिए। और फिर दालाबेहरा और जगत वहां से चले गए।

   

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