ऑस्ट्रेलिया से नहीं, क्रिकेट के बाज़ार से हारे हैं हम!
सिडनी टेस्ट के दूसरे दिन, जब जतिन सप्रू रोहित शर्मा का इंटरव्यू कर रहे थे, तभी उन्होंने रोहित से एक अजीब सा सवाल पूछा। जतिन ने पूछा, "आपको क्या लगता है कि इस टीम में बुमराह के अलावा ऐसा कौन है जो टीम इंडिया का अगला कप्तान हो सकता है?" फिर, दूसरे दिन का खेल ख़त्म होने पर, मयंती लैंगर ने ठीक यही सवाल संजय मांजरेकर से पूछा, "आपको क्या लगता है कि अगर हम बुमराह को छोड़ दें, तो रोहित के अलावा इस टीम में कौन सा खिलाड़ी है जो अगला कप्तान हो सकता है?"
मांजरेकर ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि बुमराह के अलावा कोई और कप्तान हो सकता है।" मयंती के एक-दो बार कुरेदने पर भी, जब मांजरेकर बुमराह के अलावा किसी और का नाम लेने के लिए तैयार नहीं हुए, तो मयंती ने कहा, "अरे, जैसे इस मैच में बुमराह के जाने के बाद कोहली ने कप्तानी की थी।" मगर मांजरेकर अब भी झांसे में नहीं आए और उन्होंने अगले कप्तान के तौर पर बुमराह का ही नाम लिया।
अब सवाल यह है कि जब सारी दुनिया यह कह रही है कि रोहित के बाद अगला कप्तान बुमराह को ही होना चाहिए। वह आज तीनों फॉर्मेट में न सिर्फ दुनिया के बेस्ट बॉलर हैं, बल्कि बेस्ट खिलाड़ी भी हैं। अपनी कप्तानी में वह भारत को पर्थ टेस्ट जितवा भी चुके हैं। ऐसे में क्या वजह थी कि जतिन सप्रू और मयंती रोहित और संजय मांजरेकर से "बुमराह के अलावा कौन कप्तान हो सकता है?" का सवाल पूछ रहे थे।
अगर आप इस सवाल के पीछे की सोच को समझेंगे, तो यह भी आसानी से समझ जाएंगे कि भारतीय टीम लगातार टेस्ट में बुरा प्रदर्शन क्यों कर रही है। अगर आप इस सवाल के पीछे की नीयत को समझ जाएंगे, तो यह भी आपको पता लग जाएगा कि आखिर क्या वजह है कि पिछले 4-5 सालों से खराब प्रदर्शन करने के बावजूद कुछ खिलाड़ी टीम से क्यों नहीं निकाले जा रहे।
आपको यह समझने में भी देर नहीं लगेगी कि टीम इंडिया ने ऑस्ट्रेलिया में आठ-आठ बैट्समैन क्यों खिलाए और टीम इंडिया ने विदेशी दौरों पर प्रैक्टिस मैच खेलने क्यों बंद कर दिए हैं।
स्टार स्पोर्ट्स ने "बुमराह के अलावा" वाला सवाल बार-बार क्यों पूछा? तो इसका सीधा सा जवाब है कि बुमराह sellable नहीं हैं। वह विकेट लेने के बाद कोई नौटंकी नहीं करते। वह स्टाइल आइकन नहीं हैं। उन्होंने एजेंसीज़ को पैसे देकर सोशल मीडिया पर अपने फैन पेज नहीं बनवा रखे हैं। इसलिए, इतना बड़ा प्लेयर होने के बावजूद, उन्हें लेकर वैसा हल्ला नहीं होता। दूसरी तरफ, कोहली sellable हैं। तभी आपको वह बीजीटी सीरीज़ के प्रोमो में कप्तान से ज़्यादा दिखते हैं।
भले ही कोहली ने 4 साल से टेस्ट में रन न बनाए हों, मगर बावजूद इसके स्टार स्पोर्ट्स लंच से लेकर टी ब्रेक के बीच में आपको यह याद दिलाना नहीं भूलता कि कोहली ने कैसे 2014-15 की सीरीज़ में कितने रन बनाए थे।
भारी दबाव के बावजूद रोहित शर्मा को सिडनी टेस्ट से पीछे हटना पड़ा। लेकिन उनके टेस्ट से ड्रॉप होने के बाद जब उनके रिटायरमेंट की ख़बरें चलने लगीं और बात ब्रांड वैल्यू कम होने पर आ गई, तो उन्होंने बिना किसी बड़ी वजह के स्टार स्पोर्ट्स को न सिर्फ इंटरव्यू दिया, बल्कि बिना किसी के पूछे यह भी बोल दिया कि "मैं अभी रिटायर नहीं हो रहा हूं।"
और तो और, शाम होते-होते रोहित की किरकिरी तब हो गई जब सोशल मीडिया पर फरहान अख्तर और विद्या बालन जैसी कुछ celebrities ने रोहित के पक्ष में ट्वीट कर दिए। कुछ ही देर में यह साफ हो गया कि यह सब पीआर एजेंसीज़ का किया-धरा है, ताकि रोहित के पक्ष में एक भावुक माहौल बनाया जा सके।
और यह बाज़ार क्रिकेट पर इतना हावी है। तभी तो 4 सालों से टेस्ट में 30 की औसत रखने के बावजूद, कोहली को टीम से बाहर निकालने की कोई बात नहीं करता। अगर कभी होती भी है, तो ऐसा माहौल बनाया जाता है जैसे उनके बाहर जाते ही भारतीय टीम सड़क पर आ जाएगी। यही सब बातें रोहित शर्मा पर भी लागू होती हैं।
जबकि हकीकत यह है कि इन्हीं कोहली के बिना भारत ने 2021 में ऑस्ट्रेलिया को उनके घर में हराया था। इन्हीं कोहली के बिना भारत ने पिछले साल इंग्लैंड को भारत में 4-1 से हराया था।
रोहित शर्मा ने टी20 से भले ही रिटायरमेंट ले लिया हो, मगर वह वनडे खेलते रहें, इसके लिए यशस्वी जायसवाल जैसे प्लेयर को वनडे टीम में जगह नहीं मिल रही। रोहित ने जब दोबारा टेस्ट टीम में वापसी की, तो मयंक अग्रवाल को बिना किसी बुरी परफॉर्मेंस के ठिकाने लगा दिया गया।
पूरे ऑस्ट्रेलिया दौरे में टीम इंडिया आठ-आठ बल्लेबाज़ों के साथ खेली, ताकि जैसे-तैसे कुछ रन बन जाएं और इन बड़े खिलाड़ियों की खराब फॉर्म पर सवाल न उठें। एक से दूसरे मैच के बीच कोई प्रेक्टिस मैच भी नहीं खेले जाते ताकि बैंच पर बैठे बैट्समैन रन बनाकर न बना रहे सीनियर खिलाड़ियों की जगह अपना दावा न ठोक दें।
मगर हुआ क्या...आठ- आठ बल्लेबाज़ों को खिलाने के बावजूद, 5 मैचों की 9 पारियों में भारत 6 बार 200 रन भी नहीं बना पाया। हर मैच भारत ने सिर्फ 3 गेंदबाज़ों के साथ खेला। उनमें भी भारत के दूसरे या तीसरे नंबर के गेंदबाज़ स्किल के मामले में बुमराह के एक चौथाई भी नहीं थे। इसके बावजूद हम हैरान होते हैं कि हम सीरीज़ कैसे हार गए।
मेरा शिद्दत से मानना है कि अगर लगातार फ्लॉप चल रहे सीनियर प्लेयर्स की जगह आपने दूसरे प्लेयर्स को मौका दिया होता, तो हमें एक साल पहले यशस्वी जायसवाल और नीतीश रेड्डी जैसे एक-दो consistent batsman पक्का मिल जाते।
फिर आपको अपने बैट्समैन पर भरोसा होता। आप 8 के बजाय 7 बैट्समैन खिलाते और एक गेंदबाज़ और खिला पाते। लेकिन भारत में गेंदबाज़ तो दिहाड़ी मज़दूर वर्ग से आता है। उस बेचारे की कौन सुनता है।
आपने अकेले बुमराह को रगड़-रगड़ कर उनकी कमर तोड़ दी। इन सीनियर खिलाड़ियों की खराब फॉर्म को डिफेंड करने के लिए बनाई गई आपकी ही नीति आपका काल बन गई। ऐन मौके पर बुमराह इंजर्ड हो गए और सिर्फ दो प्रॉपर गेंदबाज़ों के साथ आप सिडनी की उस मुश्किल विकेट पर आप 161 रन का स्कोर डिफेंड नहीं कर पाए।
जैसे क्रिकेट प्लेयर्स को हार या जीत देखने की आदत होती है, उसी तरह क्रिकेट फैंस भी इस हार या जीत के आदी हो जाते हैं। मगर तकलीफ तब होती है जब आप देखते हैं कि कुछ खिलाड़ी खेल से भी बड़े हो गए हैं। उन बड़े खिलाड़ियों के करियर बचाने के लिए आप अपनी बेस्ट इलेवन ही नहीं उतार रहे हैं।
सिडनी टेस्ट के दूसरे दिन बुमराह का इंजर्ड होना हर क्रिकेट फैन के लिए अफसोस की बात थी। अगर बुमराह इंजर्ड न होते, तो इंडिया मैच जीतकर सीरीज़ भी बचा सकता था। और इंडिया सीरीज़ बचा लेता तो कई खिलाड़ियों के कुकर्मों पर पर्दा पड़ जाता।
लेकिन जो हुआ, वह किसी poetic justice से कम नहीं था। आपने अपने फिसड्डी बल्लेबाज़ों को शर्मिंदगी से बचाने के लिए अपनी टीम में शामिल दुनिया के महानतम गेंदबाज़ के वर्कलोड की परवाह नहीं की। और ऐन मौके पर उनके ज़ख्मी होने से आपकी गेंदबाज़ी की गहराई expose हो गई और आप सीरीज़ हार गए।
भारत में जब तक क्रिकेट से ऊपर क्रिकेट के स्टार्स को रखा जाएगा, और खेल से ऊपर खेल के बाज़ार को, तब तक यही होता रहेगा जो बीजीटी में हुआ है। दुनिया के किसी भी हिस्से में खेल प्रेमियों के लिए खेल सिर्फ खेल नहीं होता बल्कि वो उनकी खुशियों और दुख का ठिकाना होता है। मैच के एक-एक लम्हे में उसका भावनात्मक निवेश होता है।
जब टीम जीतती है तो उसके अंदर का मामूली इंसान भी जीतता है और जब टीम हारती है तो वो अंदर से टूट जाता है। और जब आप खेल में न हारकर खेल के बाज़ार से हार जाएँ तो इससे बुरा और कुछ भी नहीं।
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