हमारा मस्तिष्क दो तरह से कार्य करता है

हमारा मस्तिष्क दो तरह से कार्य करता है *पहला* स्वयं का मूल्यांकन करते हुए अपनी त्रुटियों को सहृदयता से स्वीकार कर परिष्कृत करने की दिशा में सोचना *...*…

और*दूसरा* प्रत्येक अप्रिय कारण के लिए स्वयं का बचाव करते हुए दूसरों की गलती ढूंढ़ने में क्रियाशील रहना *...*…

प्रथम श्रेणी का मस्तिष्क हमें प्रगतिशील व लोकप्रिय बनाकर संतुष्ट व उत्कृष्ट जीवन की नींव तैयार करता *...*…

और दूसरा क्षद्म प्रभाव दिलाकर हमारे लिए अवसाद व एकाकी जीवन की इमारत तैयार करता है जिसका कभी न कभी टूटकर बिखरना निश्चित है *...*…

अब यह हमें निर्णय लेना होता है कि हम किस दिशा को अपनाएं क्योंकि जीवन के प्रारंभ में ही हम जो मार्ग चुन लेंगे हमारी रुचि व स्वभाव उसी में पुष्ट होने लगता है फिर वापसी जटिल और दुर्गम हो जाएगी *...*…

इसलिए ज्ञानियों ने गलती को स्वीकार करने को ही जीवन में सफल होने की पहली सीढ़ी बताया है यहीं से हमारी मानव से महामानव बनने की यात्रा का शुभारंभ होती है *...*…

आज अपने प्रभु से जीवन में अपनी भूलों को कभी न भूलने की अलौकिक प्रार्थना के साथ *...*…

                     *ॐ क्लीं*

    

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