परमात्मा अपने स्वभाव के कारण ही परमात्मा है....
जय श्री राधे
परमात्मा अपने स्वभाव के कारण ही परमात्मा है....भूमि,जल,वायु,आकाश, धरती...इन पंच तत्वों को जो अपने अधीन रखते है वहीं भगवान होते है... और जो इन पंच तत्वों के अधीन रहते है वहीं मनुष्य आदि सब जीव होते है....प्रकृति के इन पंच तत्वों को अपने अधीन परमात्मा कैसे रख पाते है....उसका कारण एकमात्र है प्रभु का स्वभाव....प्रभु बुरे से बुरे जीव को भी निभा लेते है...अपना मानते है...जबकि मनुष्य हो या अन्य कोई भी जीव उसके भीतर इतनी सामर्थ्य ही नहीं होती कि वह किसी को निभा सके....जो भगवान को गाली भी दे उसे भी भगवान निभाते है कि मेरा है.... और व्यक्ति ...जरा किसी ने कुछ कहा नहीं कि झट मन में उसके प्रति द्वेष रखकर बैठ जाता है....बिल्कुल ऐसे जैसे कुत्ते को किसी ने छेड़ा नहीं तो वो लगा भौंकने या काटने....सभी जीव ऐसे ही होते है किसी का उपकार याद नहीं रखते किसी का किया अपकार सदा याद रखते है....भगवान इसका ठीक उल्टा करते है....भगवान किसी के द्वारा किया छोटा सा भी उपकार भूलते नहीं.... और कोई उनका बड़े से बड़ा अपराध भी कर दे....तो भी भगवान को याद ही नहीं रहता कि उसने क्या अपराध किया था मेरा....काकभुशुंडि जी गरुड़ जी से कहते है.... अस स्वभाव कहू सुनहु न देखहु....सुन खगेश रघुपति सम लेखहु....रहती न प्रभु चित्त चूक किए की....करत सुरती सत बार हिय की....
भगवान के जैसा स्वभाव न किसी का देखा न सुना गया है आज तक....जो भूल को याद ही नहीं रखते और थोड़ा भी कोई कुछ अच्छा करे तो प्रभु उसे बिसारते नहीं है....इसलिए संत जन कहते है कोई घनश्याम सा नहीं देखा....जो भी देखा वो बेवफा देखा....🙏
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