न्याय की वेदी पर बिकती आत्माएँ: जब गद्दी पर दलाल बैठे हों तो ईमानदारी अदालत के बाहर खड़ी रोती है
न्याय की वेदी पर बिकती आत्माएँ: जब गद्दी पर दलाल बैठे हों तो ईमानदारी अदालत के बाहर खड़ी रोती है
जब पूर्व मुख्य न्यायाधीश ही खुद यह स्वीकार कर लें कि "हमारी न्यायपालिका फिक्सरों और दलालों के चंगुल में है", तो फिर इस व्यवस्था को लोकतंत्र कहना खुद लोकतंत्र का अपमान है। रंजन गोगोई ने वो कहा जो बरसों से जनता सिर्फ महसूस कर रही थी — कि भारत की अदालतें अब न्याय नहीं, व्यवस्था को चलाने वाले कुछ घाघ वकीलों की निजी दुकान बन चुकी हैं।
और ये वकील कोई मामूली नाम नहीं — कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, दुष्यंत दवे, प्रशांत भूषण — ये वो नाम हैं जो सुप्रीम कोर्ट की चौखट से ज़्यादा अपने मोबाइल नेटवर्क पर विश्वास रखते हैं। जहाँ आम आदमी सालों कोर्ट की तारीखों में गालियां खाता है, वहीं ये जनाब “टेलीफोनिक सुनवाई” से सेकंडों में आदेश निकलवा लेते हैं।
एक भारत, दो न्याय व्यवस्थाएं: आम आदमी के लिए तारीख पे तारीख, दलालों के लिए टेलीकॉल पे बेल
अगर आप ‘तीस्ता सीतलवाड़’ जैसे नाम हो, तो अरबों के विदेशी चंदे में शराब, गहने, होटल का खर्च भी “मानवाधिकार” हो जाता है।
गुजरात हाइ कोर्ट से जमानत नहीं मिलने के बाद तुरंत
जब मुंबई पुलिस उनके घर दरवाजे पर पहुंचती है, तभी सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे फोन पर खुल जाते हैं — और तीन मिनट में आदेश मिल जाता है, बिना कोई सुनवाई, बिना कोई बहस।
क्या यही है वो न्याय जो एक 20 पैसे के घोटाले में फँसे बस कंडक्टर को 40 साल तक जेल की हवा खिलाता है?
रंजन गोगोई कहते हैं – “अगर आप अरबपति हैं, तो वकील ही जज को बताएंगे कि क्या फैसला देना है।” यानी अब अदालतों में न्याय नहीं, स्क्रिप्टेड ड्रामा होता है — और पटकथा लेखक हैं हमारे तथाकथित “वरिष्ठ अधिवक्ता”, जो कभी कोर्ट में तो कभी टीवी डिबेट में “लोकतंत्र की रक्षा” की नौटंकी करते हैं।
जहाँगीरपुरी में बुलडोजर चला नहीं, सुप्रीम कोर्ट का स्टे पहले आ गया!
यहाँ तो न्याय की स्पीड चीता को भी मात दे दे! जैसे ही बुलडोजर पहुंचा, वैसे ही कपिल सिब्बल और दुष्यंत दवे सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गए — और 15 मिनट में स्टे ऑर्डर! वाह भई, भारत के गरीबों के केस में तो एक तारीख मिलने में महीनों लगते हैं, और यहाँ 15 मिनट में न्याय?
PMLA: आम आदमी के लिए लोहे का कानून, केजरीवाल के लिए रबड़ की छड़ी है
जिस कानून के तहत जमानत “असाधारण” मानी जाती है, उसी PMLA कानून में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को बेल मिल जाती है। क्यों? क्योंकि वकील साहब कोई और नहीं, ‘फिक्सर-इन-चीफ’ वकील इन चैंबर "मुझे जज कब बना रिए हो" हैं! और फिर केस को सौंपा गया उस बेंच को… जो अभी तक बनी ही नहीं है। यही है ‘जैसा चाहो वैसा न्याय’ का मॉडल!
"5 ट्रिलियन इकॉनमी"? पहले इस दलाली की दीमक से मुक्ति तो मिले
रंजन गोगोई ने बिल्कुल सही कहा – जब तक भारत की अदालतें इन फिक्सरों से मुक्त नहीं होतीं, तब तक न भारत 5 ट्रिलियन बनेगा और न ही आत्मनिर्भर। क्योंकि जब न्याय बिक जाए, तो कानून सिर्फ अमीरों का हथियार और गरीबों का चाबुक बन जाता है।
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