सबके अपने अपने पाखंड हैं।

परम्पराऐं विकृत होती हैं तो उन्हें सम्भालने की जिम्मेदारी भी हम परंपरा के वाहकों की है।पहले ही इतनी सजगता, सावधानी और गतिशीलता रखते कि अपनी दाढ़ी दूसरे के हाथ मे नहीं देनी पड़े।एक बीमारी छोड़ कर दूसरी में गिरना, हम भारतीयों का दुर्भाग्य है।एक नशा छोड़ा, दूसरा पकड़ लिया।जो लोग दूसरों के कहे पर चलते हैं, उनको तो भटकना ही पड़ता है।
कभी धर्म अर्थ काम मोक्ष की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होती थी।
आज मीडिया द्वारा थोपी गई प्रतिस्पर्धा होती है।"इस महिला ने इतने पुरुषों से समागम किया!"या"इस पुरूष ने इतनी लड़कियों के साथ सम्बन्ध बनाया!"क्या ये स्वस्थ सन्देश हैं?यदि कभी जूते खाने की प्रतिस्पर्धा शुरू हुई तो भारतीय प्रथम आएंगे क्योंकि वे वामपंथियों के बिछाए एजेंडे के अनुसार चलते हैं, उनका स्वयं का कोई मौलिक चिंतन बचा ही नहीं है।

तेरहवीं एक छलावरण शब्द है जो वामपंथियों ने हिंदुओं पर वैसे ही थोपा है जैसे हिंदुओं द्वारा स्वयं की बर्बादी के इकोसिस्टम को सेक्युलरिज्म कहा गया। तुष्टीकरण को त्याग, 
कामवासना मिटाने की इच्छा को प्यार कहा, नंगे होने को बोल्ड कहा, ठरक को रिलेशनशिप कहा, परिवार में एक को दूसरे के विरुद्ध भड़काने को न्याय के लिए आवाज उठाना कहा,
 बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अनुकूल नौकरों की सृष्टि को स्किल कहा, स्वयं को उच्च परम्परा से जोड़ने को मनुवादी कहा और बालकों द्वारा पढ़ाई लिखाई के समय यौन व्यवहार, आदि दुर्व्यसनों को नेचुरल कहा।वास्तव में तेरहवीं  का भोज कोई परम्परा ही नहीं थी।

कृतकृत्य व्यक्ति जब तीर्थयात्रा सम्पन्न करके वापस लौटते थे, जो कि उस समय बहुत कम सम्भावना होती थी, तब उस खुशी में हवन प्रसादी वगैरह हुआ करती थी।रूढ़िवादी स्त्रैण व्यवस्था में, जहां एक ताना मारने पर व्यक्ति को जीवन निरर्थक लगने लगता है, यह परम्परा भी प्रदर्शन और आडम्बर की भेंट चढ़ गई।बाद में मरने वाले की अस्थियां भी तीर्थ विसर्जन के उपलक्ष्य में सक्षम लोग भोज देने लगे।मृत व्यक्ति यदि बुजुर्ग है तो सकुटुंबक लोग एक जगह भोजन करते थे, सारी महिलाएं मिलजुलकर भोजन बनाती, घर मे चहल पहल रहती, ऐसा करने से शोक कम हो जाता है, कुछ खास सम्बन्धी भी यदि वहीं ठहरे हुए हैं तो भोजन तो करेंगे ही, ऐसी एक व्यवस्था थी।12वे दिन क्रिया के बाद घर वाले भी मुक्त होकर नित्य की दिनचर्या में लग जाएं इसलिए जो न पहुंचा वह भी पहुंच जाए, जाहिर है कि लोग आए है तो भोजन भी करेंगे।लेकिन तेरहवीं जैसा शब्द कहीं भी शास्त्रों में नहीं है।आज तो सभी समाजों में मृत्यु भी एक फॉर्मलटी है, दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति के यहाँ "बैठने" जाने की ऐसी होड़ मची है कि उसमें भी दुर्घटना हो जाती है।
जिस घर में अकाल मृत्यु हुई है वहाँ लोग आते हैं और 15 मिनट में रवाना हो जाते हैं। भोजन तो क्या, चाय भी पीने की इच्छा नहीं होती।रही बात अंतिम दिन बड़ा भोज करने की, अमल, डोडा, बीड़ी वगैरह के अपव्यय की, तो इस पर यदि रोक लगती है तो अच्छा ही है, इसका मृतक के श्राद्ध से कोई सम्बन्ध भी नहीं।किंतु सन्देह है क्योंकि सामाजिक हस्तक्षेप सफल कम ही होते हैं।उसका भी कारण है। नेता राजनेता और  संपन्न लोग स्वयं मृतकों को अपने लिए भुनाते हैं। कई लोग बैकुंठी आदि के बहाने अपने वैभव का प्रदर्शन करते हैं।  शवयात्रा में कौन शामिल हुआ, इसका भी लेखा जोखा रखते हैं। मरने वाला जब तक जीवित था, चाहे एक पैरासिटामोल को भी तरसता रहा हो लेकिन बाद में जलेबी, हलवा,पूड़ी बांटी जाती है, यह पाखंड, सर्वत्र व्याप्त है तो लोग हमारी  आपकी क्यों मानेंगे।
तेरहवीं जो करना चाहिए, जैसे श्राद्ध-तर्पण-दान-यज्ञ इत्यादि शास्त्रोक्त है, लेकिन वह तो मंद हो गया, विधि भी नहीं जानते, और जैसे वामपंथियों को जननांगों के इर्दगिर्द सारी दुनिया दिखती है वैसे ही नास्तिक-अधोगामी भुक्खड़ों को भोज ही भोज नजर आता है।मृतक के श्राद्ध में खीर पूड़ी इत्यादि का प्रचलन भारतीय परिवेश के अनुकूल था। ईसाइयों में वाइन और ब्रेड का उपयोग होता है। मुस्लिम भी जनाजे के समय मांस-पुलाव आदि पकाते हैं। आई हुई भीड़ को भोजन कराना मृत्युभोज नहीं है,  बनारस में तो घाट पर ही मिठाई खिलाई जाती है। कई बार, लौटते शवयात्री बाजार में बिखर जाते हैं और कचौरी खाकर घर जाते हैं।ताना मारना, वैभव प्रदर्शन और होड़ का अड्डा बनाकर घर वाले को लूटकर चूस लेने वाले अनुष्ठान यदि बन्द होते हैं तो यह स्वागतयोग्य है। लेकिन इस मामले में उन लोगों को बोलने का कोई अधिकार नहीं है जो जन्मदिन पर केक, विवाह वर्षगांठ पर पार्टी और बिना किसी उपलब्धि के ही केवल देखादेखी फिजूलखर्ची करते हैं और अपनी इमेज चमकाने को मृत्युभोज पर भाषण देते हैं, क्योंकि ये भी पाखंड हैं।
सबके अपने अपने पाखंड हैं।पाखंड कभी भी प्रतिस्पर्धा में बदलकर खतरनाक परम्परा बन सकता है।एक खड्ड से निकलोगे दूसरी उससे भी गहरी में गिर जाएंगे।।

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