सब विधाता के द्वारा पूर्व से ही लिखित है

पूर्वपक्ष- यदि सब विधाता के द्वारा पूर्व से ही लिखित है तो कर्म करने से क्या प्रयोजन? सरल भाषा में- जब भगवान की इच्छा के बिना पत्ता तक नही हिलता तो बाकी सब कैसे उनकी इच्छा के बिना हो सकता है या क्यूं होता है या हमें कुछ करने की आवश्यकता ही क्या है।*

 उत्तर- जीवात्मा कर्म करने में स्वतन्त्र है। ईश्वरने जीवात्मा को कर्म करने का सामर्थ्य दिया है तथा उस कर्म का क्या फल देगा उसका विधान बनाया है। श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है की `'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु'` अर्थात्- तेरा कर्म पर अधिकार है, फल पर नहीं। इसलिए यह मानना की सारे कर्म ईश्वर द्वारा पुर्वनिर्धारीत है वह बात अशास्त्रीय है। यदि ऐसा हो तो, जीवात्मा के कर्मो का उत्तरदायित्व ब्रह्म पर आ जाता है तथा उनके पाप-पुण्य को ब्रह्म को ही भुगतना पडेगा। लेकिन ऐसा सम्भव नहीं है।*

 परमात्मा केवल साक्षी है। `ऋग्वेद के मन्त्र १.१६४.२०` में जीवात्मा को कर्म करता हुआ बताया है और परमात्मा उसके कर्म को साक्षीभाव से देखता है तथा उसके कर्म को देखकर फल देता है।*इसलिए कौन से कर्म का क्या फल होगा, यह विधि का विधान है जो अटल है। लेकिन जीवात्मा को क्या कर्म करना है, वह निश्चय करने के लिए जीवात्मा स्वतन्त्र है।*


*🚩 ॐ परमात्मने नम 🙏

Comments

Popular posts from this blog

बात कड़वी है मगर सच्ची है

शर्मिष्ठा नाम की कोई सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर बच्ची है।

हम कैसे बेवकूफ बन रहें हैं