शस्‍त्रधारियों में राम*

गंगा के पानी की बड़ी केमिकल परीक्षाए हुई है। वैज्ञानिक। और अब तो यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो गया है कि उसका पानी असाधारण है।

यह क्यों है असाधारण, यह भी थोड़ी हैरानी की बात है। क्योंकि गंगा जहां से निकलती है, वहां से बहुत नदियां निकलती हैं। गंगा जिन पहाड़ों से गुजरती है, वहां से कई नदियां गुजरती हैं। तो गंगा में जो खनिज और जो तत्व मिलते हैं, वे और नदियों में भी मिलते हैं। फिर गंगा में कोई गंगा का ही पानी तो नहीं होता, गंगोत्री से तो बहुत छोटी—सी धारा निकलती है। फिर और तो सब दूसरी नदियों का पानी ही गंगा में आता है। विराट धारा तो दूसरी नदियों के पानी की ही होती है।

लेकिन यह बड़े मजे की बात है कि जो नदी गंगा में नहीं मिली, उस वक्त उसके पानी का गुणधर्म और होता है और गंगा में मिल जाने के बाद उसी पानी का गुणधर्म और हो जाता है! क्या होगा कारण? केमिकली तो कुछ पता नहीं चल पाता। वैज्ञानिक रूप से इतना तो पता चलता है कि विशेषता है और उसके पानी में खनिज और केमिकल्स का भेद है। विज्ञान इतना ही कह भी सकता है। लेकिन एक और भेद है, वह भेद विज्ञान के खयाल में आज नहीं तो कल आना शुरू हो जाएगा। और वह भेद है, गंगा के पास लाखों—लाखों लोगों का जीवन की परम अवस्था को पाना।

यह मैं आपसे कहना चाहूंगा कि पानी, जब भी कोई व्यक्ति, अपवित्र व्यक्ति पानी के पास बैठता है— अंदर जाने की तो बात अलग—पानी के पास भी बैठता है, तो पानी प्रभावित होता है। और पानी उस व्यक्ति की तरंगों से आच्छादित हो जाता है। और पानी उस व्यक्ति की तरंगों को अपने में ले लेता है।

इसलिए दुनिया के बहुत धर्मों ने पानी का उपयोग किया है। ईसाइयत ने बप्तिस्मा, बेप्टिज्‍म के लिए पानी का उपयोग किया है।

जीसस को जिस व्यक्ति ने बप्तिस्मा दिया, जान दि बेप्टिस्ट ने, उस आदमी का नाम ही पड़ गया था जान बप्तिस्मा वाला। वह जोर्डन नदी में— और जोर्डन यहूदियों के लिए वैसी ही नदी रही, जैसी गंगा हिंदुओं के लिए—वह जोर्डन नदी में गले तक आदमी को। डुबा देता, खुद भी पानी में डूबकर खड़ा हो जाता, फिर उसके सिर पर हाथ रखता और प्रभु से प्रार्थना करता उसके इनीशिएशन की, उसकी दीक्षा की।

पानी में क्यों खड़ा होता था जान? और पानी में दूसरे व्यक्ति को खड़ा करके क्या कुछ एक व्यक्ति की तरंगें और एक व्यक्ति के प्रभाव और एक व्यक्ति की आंतरिक दशा का आंदोलन दूसरे तक पहुंचना आसान है?

आसान है। पानी बहुत शीघ्रता से चार्ज्‍ड हो जाता है। पानी बहुत शीघ्रता से व्यक्तित्व से अनुप्राणित हो जाता है। पानी पर छाप बन जाती है।

लाखों—लाखों वर्ष से भारत के मनीषी गंगा के किनारे बैठकर प्रभु को पाने की चेष्टा करते रहे हैं। और जब भी कोई एक व्यक्ति ने गंगा के किनारे प्रभु को पाया है, तो गंगा उस उपलब्धि से वंचित नहीं रही, गंगा भी आच्छादित हो गई है। गंगा का किनारा, गंगा की रेत के कण—कण, गंगा का पानी, सब, इन लाखों वर्षों में एक विशेष रूप से म्प्रिचुअली चार्ब्द, आध्यात्मिक रूप से तरंगायित हो गया है।

इसलिए हमने गंगा के किनारे तीर्थ बनाए। इसलिए लोग गंगा की यात्रा करते रहे। इसलिए लोग सोचते थे कि गंगा में जाकर पाप धुल जाएंगे। वह पाप गंगा की वजह से नहीं धुल सकते, लेकिन गंगा के पास जो मिल्यु है, गंगा के पास जो वातावरण है, वह जो लाखों—लाखों वर्षों की छाया है, उस छाया में जरूर आप अगर अपने हृदय के द्वार खोलें, तो आप दूसरे आदमी होकर वापस लौट सकते हैं। गंगा एक आध्यात्मिक यात्रा भी है, एक नदी ही नहीं। और इस तरह के बहुत—से प्रयोग हुए हैं।

जैनों के बाईस तीर्थंकर पार्श्वनाथ हिल्स पर निर्वाण को उपलब्ध हुए है। एक ही पर्वत पर बाईस तीर्थंकर निर्वाण को उपलब्ध हुए हैं, चौबीस तीर्थंकर में से। यह आकस्मिक नहीं मालूम होता, क्योंकि बाईस तीर्थंकर चौबीस में! हजारों साल का फासला है। इन हजारों साल में ये बाईस व्यक्ति अपने मरने के क्षण में एक छोटी—सी पहाड़ी पर पहुंच गए!

यह पूर्व नियोजित है, आयोजित है। उस पूरे पहाड़ को चार्ज करने की चेष्टा जैन तीर्थंकरों ने की है। वह पूरा पहाड—जब एक तीर्थंकर अपने शरीर को छोड़ता है, तो यह घटना उस घटना से बड़ी है, जब एक अणु का विस्फोट होता है। लेकिन वह हमें पता चल गई है; अभी दूसरी घटना हमें पता नहीं चली है।

वैज्ञानिक अब कहते हैं कि एक अणु के विस्फोट से इतनी ऊर्जा पैदा होती है कि सारी पृथ्वी आग से भर जाए। हिरोशिमा में जो अणु का विस्फोट हुआ, उसमें एक लाख बीस हजार आदमी पांच सेकेंड में राख हो गए। अणु आंख से दिखाई नहीं पड़ता, इतनी छोटी चीज है। और अणु के विस्फोट का मतलब क्या है? अणु के विस्फोट का मतलब है कि अणु तीन, इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्द्वान से मिलकर बनता है। उन तीनों को अलग कर दिया जाए, तो जिस शक्ति के द्वारा वे तीनों जुड़े थे, वह शक्ति रिलीज हो जाती है, मुक्त हो जाती है। वही शक्ति एक लाख बीस हजार आदमियों को पांच सेकेंड में राख कर देती है।

एक छोटा—सा अणु जो आंख से दिखाई नहीं पड़ता! अगर हम अणु को समझना चाहें, तो अगर एक लाख अणुओं को एक के ऊपर एक रखें, तो आपके बाल की मोटाई के बराबर होंगे। एक इतना छोटा—सा अणु एक लाख बीस हजार आदमियों को राख कर देता है विस्फोट से।

और जब एक तीर्थंकर की आत्मा उसके शरीर से छूटती है, तो जो शक्ति आत्मा को और शरीर को बांधे हुए थी, वह रिलीज होती है, पहली दफा। करोड़ों—करोड़ों वर्षों से यह आदमी शरीर से बंधा रहा है। अब इसकी आत्मा सदा के लिए शरीर को छोड़ रही है। शरीर और इसको बांधने वाली जो शक्ति थी, वह छूटेगी। वही शक्ति इस पहाड़ पर बिखर जाएगी।

बाईस तीर्थंकर जाकर उस पहाड़ को इलेक्ट्रिफाइड कर दिए, वह पहाड़ मैग्नेटिक हो गया। फिर इसके बाद लाखों वर्षों तक लोग उस पहाड़ की तीर्थयात्रा करते रहे हैं, इस आशा में कि वह मैग्नेटिज्म, वह चुंबक, उनके प्राणों को भी छू ले और स्पर्श कर ले।

जैसा जैनों ने प्रयोग किया है पार्श्वनाथ हिल्स पर, ठीक वैसा ही प्रयोग हिंदुओं ने गंगा के किनारे किया है।

अरब में एक गांव है, कुफा। उस गांव में अब तक मुसलमान के अतिरिक्त कोई भी प्रवेश नहीं पा सका, सिर्फ एक आदमी को छोड्कर, पूरे इतिहास में चौदह सौ साल के। मुसलमान के अतिरिक्त उस गांव में प्रवेश नहीं हो सकता, और साधारण मुसलमान भी प्रवेश नहीं पा सकता है। असाधारण रूप से, वस्तुत: जो मुसलमान हो, सच में जिसका हृदय रूपांतरित हुआ हो और परमात्मा के लिए समर्पित हो गया हो, और जिसने जाना हो कि एक ही अल्लाह है, वही प्रवेश पा सकता है।

सिर्फ एक आदमी, एक अंग्रेज खोजी बर्टन उसमें प्रवेश पा सका है गैर—मुसलमान। लेकिन उसको भी गैर—मुसलमान कहना ठीक नहीं है। क्योंकि बीस साल उसने मुसलमान साधना की, सिर्फ उस गांव में प्रवेश पाने के लिए। और जब वह बिलकुल मुसलमान हो गया, नाममात्र को ही बर्टन रह गया, चमड़ी भर अंग्रेज की रह गई और सब तरह से वह मुसलमान हो गया, तब उसे प्रवेश मिला।

मुसलमानों ने इस गांव को प्रयोग किया है चार्ज करने का। इन चौदह सौ वर्षों में उन्होंने एक अनूठी छोटी—सी जगह निर्मित की है। उसमें प्रवेश पाते ही कोई आदमी रूपांतरित हो जाए, ऐसी व्यवस्था की है। उसमें वे ही लोग प्रवेश पा सकते हैं, जो बहुत गहन प्रार्थना में उतर गए हैं। वह सारा वातावरण उससे प्रभावित हो जाता है। कण—कण उनके प्रभाव को पी लेता है, आत्मसात कर लेता है।

कृष्‍ण कहते हैं, मैं नदियों में गंगा हूं।

गंगा साधारण नदी नहीं है, एक आध्यात्मिक यात्रा है, और एक आध्यात्मिक प्रयोग। लाखों वर्षों तक लाखों लोगों का उसके निकट मुक्ति को पाना, परमात्मा के दर्शन को उपलब्ध होना, आत्म— साक्षात्कार को पाना! लाखों लोगों का उसके किनारे आकर अंतिम घटना को उपलब्ध होना! वे सारे लोग अपनी जीवन—ऊर्जा को गंगा के पानी पर उसके किनारों पर छोड़ गए हैं।

इसलिए कृष्‍ण कहते हैं कि मैं नदियों में गंगा हूं।

और हे अर्जुन, सृष्टियों का आदि, अंत और मध्य मैं ही हूं। तथा विद्याओं में अध्यात्म—विद्या अर्थात ब्रह्म—विद्या, और परस्पर विवाद करने वालों में तत्व—निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद, तर्क मैं ही हूं न्याय मैं ही हूं।

ये दो बातें बहुत बहुमूल्य हैं। विद्याओं में अध्यात्म—विद्या। अनंत विद्याएं हैं, लेकिन अध्यात्म—विद्या गुणात्मक रूप से भिन्न है।

अगर कोई फिजिक्स का जानकार हो जाए, कोई केमिस्ट्री का जानकार हो जाए, कोई गणित को जान ले, कोई ज्योतिष को जान ले, कोई संगीत को जाने— हजार विद्याएं हैं—कोई किसी भी विद्या में कितना ही पारंगत हो जाए, स्वयं तो अंधेरे में ही खड़ा रहता है। कितना ही बड़ा संगीतज्ञ हो और कितना ही संगीत जान ले, लेकिन खुद के स्वरों से अपरिचित होता है। सब स्वरों को साध ले, खुद की आत्मा अनसधी रह जाती है। सब वाद्यों को बजा ले, एक भीतर की वीणा सूनी ही पड़ी रह जाती है। कोई कितना ही बड़ा गणितज्ञ हो, और कितनी ही संख्याओं को जान ले, अनंत संख्याओं का हिसाब उसके मन में सरलता से हल होने लगे, लेकिन एक संख्या स्वयं की, वह अनगिनी रह जाती है।

सुना होगा आपने कि दस अंधों ने एक बार नदी पार की थी। बाढ़ आई नदी थी बरसा की। पार तो वे कर गए, फिर उन्हें खयाल आया कि कोई अंधा रास्ते में बह न गया हो! तो उन्होंने गिनती की थी। लेकिन कठिनाई वही हुई, जो सभी आदमियों के साथ होती है। गिनती नौ होती थी, क्योंकि हर गिनने वाला अपने को छोड़ जाता था। गिनता था एक से नौ तक। और जब सभी ने गिनकर देख लिया और सभी ने पाया कि संख्या नौ होती है, तो निर्णय हो गया कि एक आदमी खो गया है।

हम सब निर्णय इसी तरह तो लेते हैं! डेमोक्रेटिक निर्णय इसी तरह तो होते हैं! जब दस आदमी सभी के सब कह रहे हों कि नौ हैं, तो अब कोई उपाय न रहा। वे छाती पीटकर रोने लगे थे कि उनका साथी कोई खो गया।

पास से कोई गुजरा है और उसने पूछा कि क्या कारण है तुम्हारे इस तरह जार—जार रोने का? तो उन अंधों ने कहा, हम दस निकले थे उस पार से, एक साथी खो गया। हम नौ हैं! उस आदमी ने आंख डाली। देखा, वे दस थे। उसने कहा, जरा देखूं तुम्हारी गिनती करने में कोई भूल तो नहीं? उन्होंने गिनती करके बताई, तो वह समझ गया भूल। भूल वही है, जो सब आदमियों की भूल है। हर एक अपने को गिनना छोड़ जाता है।

तो उस आदमी ने कहा कि एक तरकीब का मैं उपयोग करता हूं इससे चमत्कार घटित होगा और दसवां आदमी मौजूद हो जाएगा। मैं हर एक को चांटा मारूंगा जोर से। जिसको मैं चांटा मारूं, वह बोले एक। जब मैं दूसरे को चांटा मारूं दो, तो वह बोले दो। जब मैं तीसरे को चांटा मारूं तीन, तो वह बोले तीन। और ऐसे मैं दसवें को मौजूद कर दूंगा।

उसने दसों को चांटे मारे। उनकी व्यर्थ पिटाई भी हुई, लेकिन वे आनंदित भी बहुत हुए। और दसों नाचने लगे और उस आदमी को धन्यवाद देने लगे कि तुम्हारी बड़ी कृपा है कि तुमने दसवां मौजूद कर दिया।

समस्त साधनाएं आपको चांटा मारने से ज्यादा नहीं हैं। जिसमें आपको एक का…। और कुछ नहीं है। और समस्त गुरु आपको सिवाय चांटा मारने के और कुछ भी नहीं करते हैं, कि किसी तरह आपका वह जो खो गया आदमी है, वह आपके खयाल में आ जाए। वह अभी भी मौजूद है, वह कहीं खो नहीं गया है। वे दस ही थे, लेकिन हर एक अपने को गिनना भूल जाता था।

सारी विद्याएं दूसरों को गिनती हैं, स्वयं को छोड्कर। सब विद्याएं दूसरे को जानती हैं, स्वयं को छोड्कर। इसलिए सभी विद्याओं के भीतर गहन अविद्या छिपी रहती है। इसलिए एक आदमी गणित का बहुत बड़ा पारंगत विद्वान हो जाता है, लेकिन जिंदगी के मामले में ऐसा ही मूढ़ होता है, जैसे कोई और छू है। एक आदमी बडा वैज्ञानिक हो जाता है। वैज्ञानिक तो ठीक है, यहां तक हालत होती है कि एक आदमी बड़ा मनोवैज्ञानिक हो जाता है, बड़ा साइकोलाजिस्ट हो जाता है, मन के संबंध में सब जान लेता है, लेकिन खुद के मन के संबंध में वैसा ही दीन और कमजोर होता है, जैसा कोई और।

खुद फ्रायड, जिसने पूरे जीवन यौन और यौन से संबंधित सारी बीमारियों का अध्ययन किया और यौन की सारी विकृतियों का अध्ययन किया, उसने भी लिखा है कि पचास साल की उम्र में भी एक दिन अचानक रास्ते से गुजरती हुई एक स्त्री को देखकर धक्का देने का मन हो गया। यह आदमी ईमानदार है। हमारे मुल्क का कोई आदमी होता तो ऐसा कभी बताता नहीं। पर उसने लिखा है कि हैरानी की बात है कि अब पचास साल की उस में भी रास्ते पर एक स्त्री को देखकर धक्का लगाने का मन मेरा हुआ है।

अगर आप फ्रायड से पूछें, तो क्रोध के संबंध में वह सब जानता। है। लेकिन अगर उसको गाली दे दें, तो वह इतना क्रोधित हो जाता था कि बिलकुल पागल हो जाए।

यह मजे की बात है। मनोविज्ञान भी आप जान ले सकते हैं, वह भी दूसरे के बाबत है। अपने संबंध में उसका कुछ लेना—देना नहीं है। स्वयं आदमी अपरिचित ही रह जाता है।

अध्यात्म—विद्या उसकी विद्या है, जिससे हम स्वयं को जानते हैं। और तब यह भी हो सकता है कि एक अध्यात्म ज्ञानी कुछ भी और न जानता हो।

रामकृष्ण दूसरी क्लास तक पढ़े हैं। शास्त्र ठीक से पढ़ नहीं सकते। बातें भी जो करते हैं, वे ग्रामीण की हैं। लेकिन वे उस विद्या को जानते हैं, कृष्ण जिसके साथ अपना तादात्म्य कर रहे हैं। कबीर जुलाहे हैं। नानक पढे—लिखे नहीं हैं। मोहम्मद को क ख ग भी नहीं आता। दस्तखत भी मोहम्मद नहीं कर सकते हैं। लेकिन कृष्ण कह रहे हैं कि मैं विद्याओं में अध्यात्म—विद्या हूं।

क्योंकि मान्यता यह है कि जिसने सब जान लिया और स्वयं को न जाना, उसके जानने का उपयोग क्या? और जिसने कुछ भी न जाना और स्वयं को जान लिया, उसने सब जान लिया। क्योंकि अंततः जीवन का जो परम आनंद है, वह स्वयं को जानने से घटित होगा। और अंतत: मृत्यु के भी पार जाने वाला जो अमृत सूत्र है, वह स्वयं को जानने से घटित होगा। और अंतत: सब जाना हुआ जो हमारा पराया है, वह पड़ा रह जाएगा; जो मेरे साथ जा सकेगा, वह मेरा स्वयं का बोध है।

मृत्यु के पार जिसे न ले जाया जा सके, उसे हम ज्ञान नहीं मानते। हम तो ज्ञान उसे मानते हैं कि लपटों में जब शरीर भी जल जाए, तब भी मेरा शान न जले। आग भी मेरे ज्ञान को न जला सके, मृत्यु भी मेरे ज्ञान को नष्ट न कर सके, तो ही वह ज्ञान है। अन्यथा उस ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है।

तो हम सब जान लें, वह जानना ऊपरी है। उपयोगी हो सकता है, लेकिन आत्यंतिक उसका मूल्य नहीं है। अंततः वह व्यर्थ हो जाएगा। इसलिए हम बड़े से बड़े पंडित को भी, जो बहुत जानता हो, मरते वक्त वैसा ही दीन हो जाते देखते हैं, जैसा कोई भी मर रहा हो। मृत्यु बता देती है कि आपने कुछ जाना कि नहीं जाना। मृत्यु खबर दे देती है।

हिंदुस्तान से सिकंदर जब वापस लौटता था। तो उसके गुरु ने, अरस्तू ने उसे कहा था कि हिंदुस्तान से एक संन्यासी को लेते आना आते वक्त।

अरस्तू महाज्ञानी था। ज्ञानी, पंडित के अर्थ में। बहुत जानता था। सच तो यह है कि पश्चिम में जितने विज्ञान विकसित हुए, सबका पिता अरस्तू है। सबका! जितने विज्ञान विकसित हुए, सबकी आधारशिलाए अरस्तू रख गया। एक अकेले आदमी ने इतने विज्ञानों को क भी जन्म नहीं दिया। इसलिए अरस्तू अदभुत है।

लेकिन उसने भी सिकंदर को कहा था कि जब तुम आओ हिंदुस्तान से, तो बहुत कुछ लूटकर लाओगे, एक संन्यासी को भी साथ ले आना। एक संन्यासी को मैं देखना चाहता हूं। मैं उस आदमी

को देखना चाहता हूं जिसने स्वयं को जान लिया है।

यह अरस्तु इतना बड़ा ज्ञानी था, तर्क का पिता था। पश्चिम का जो लाजिक है, वह अरस्तु से पैदा हुआ। अब भी वही काम में आता है, दो हजार साल हो गए। इतना शानी था, लेकिन स्वयं का तो कोई ज्ञान न था। तो हालत उसकी यह थी कि सिकंदर की गुलामी की वजह से, क्योंकि सिकंदर तो सम्राट था। हालांकि अरस्तु गुरु था! लेकिन इस तरह की कहानियां हैं कि सिकंदर शिष्य था, वह कभी—कभी अरस्तु को कहता कि अच्छा तुम घोड़ा बनो, मैं तुम्हारे ऊपर सवार होकर जरा चलूं र तो अरस्तु घोड़ा बनकर सिकंदर को चलाता था।

सिकंदर ने सोचा कि जब अरस्तु जैसे आदमी को मैं घोड़ा बनाकर चलता हूं तो संन्यासी एक क्या, दस—पचास पकड़वा लाऊंगा।

जब वह हिंदुस्तान से लौटने लगा, तब उसे खयाल आया। जिस गांव में वह ठहरा था, उसने आदमी भेजे कि कोई संन्यासी हो तो पकड़ लाओ। गांव के लोगों से सिपाहियों ने पूछा, तो गांव के लोगों ने कहा, जो तुम्हारी पकड़ में आ जाए, समझ लेना, वह ले जाने योग्य नहीं है! तो वे बड़ी मुश्किल में पड़े। उन्होंने कहा, फिर कौन है ले जाने योग्य? तो गांव के लोगों ने कहा, एक आदमी है, लेकिन सिकंदर एक क्या, हजार सिकंदर भी उसको ले जा सकें, यह बहुत मुश्किल है! उन्होंने कहा, उसी का पता बता दो। तो उन्होंने कहा, नदी के किनारे एक नग्न संन्यासी है, उसे तुम ले जाओ।

सिपाही गए, उन्होंने कहा कि महान सिकंदर की आज्ञा है कि आप हमारे साथ चलें। शाही सम्मान के साथ हम आपको यूनान ले जाएंगे। जो भी आपकी सुविधा, हम सब करेंगे। आप शाही अतिथि होंगे। महल में ही आप ठहरेंगे। सिकंदर के विशेष मेहमान होंगे। वह फकीर हंसने लगा और उसने कहा कि आज्ञा! आशा तो हमने किसी की भी माननी बंद कर दी। जिस दिन हमने आज्ञा माननी बंद की, उसी दिन तो हम संन्यासी हुए। जब तक हम किसी न किसी की आशा मानते थे, तब तक हम गृहस्थ थे। सिकंदर को कह दो कि तुम गलत आदमी के पास आ गए। उन्होंने कहा, आपको पता नहीं, सिकंदर खतरनाक है। वह क्रोधी है। वह गर्दन काट दे सकता है। तो उसने कहा, तुम सिकंदर को ही बुला लाओ— उस संन्यासी ने कहा— क्योंकि बड़ा मजा आएगा!

सिकंदर ने सुना, तो सिकंदर नंगी तलवार लेकर गया। भारत में सिकंदर की यात्रा में यह सबसे कीमती घटना है। वह तलवार लेकर गया और उसने संन्यासी से कहा कि मैं आदमी कठोर हूं। हां और न में जवाब चाहता हूं। साथ चलते हो, ठीक। अन्यथा यह गर्दन को काट देता हूं।

उस फकीर ने कहा, तुम काट दो। जहां तक मेरा सवाल है, इस गर्दन को तो मैं उसी दिन छोड़ चुका, जिस दिन मैंने संन्यास लिया। मेरी तरफ से यह कटी हुई है। और तुमसे मैं कहता हूं कि जब गर्दन कटकर गिरेगी, तो तुम भी देखोगे कि गिर रही है और मैं भी देखूंगा कि गिर रही है। क्योंकि मैं इस गर्दन से अलग हूं। तुम देर मत करो। बेकार समय मत गवाओ। क्योंकि मैं भी आदमी साफ—सुथरा हूं। तलवार बाहर निकालो और गर्दन काटो। तुम अपने काम पर जाओ। तुम अपनी यात्रा पर, मैं अपनी यात्रा पर!

सिकंदर ने तलवार वापस रख ली और उसने अपने सिपाहियों से कहा कि इस आदमी को मारने का कोई अर्थ नहीं है। हम केवल उसी को मार सकते हैं, जो मृत्यु से डरता हो। मारा ही उसको जा सकता है। मरता ही वही है, जो मृत्यु से डरता है। इस आदमी को मारने का कोई अर्थ नहीं। नाहक हमें ही पछतावा होगा। और पीछे हम ही चिंता में पड़ेंगे। यह आदमी चिंता में पड़ने वाला नहीं दिखाई पड़ता है। यह मेरी ही नींद हराम कर देगा। इसकी गर्दन मुझे ही बार—बार याद आती रहेगी, और मेरी ही रास्ते की यात्रा खराब हो जाएगी।

ब्रह्म—विद्या, अध्यात्म—विद्या का अर्थ है, वह विद्या, वह सुप्रीम साइंस, जिससे हम उसे जान लेते हैं, जो हम हैं। जिससे हम उसे जान लेते हैं, जो सब जान रहा है। जिससे हम उसे जान लेते हैं, जिसकी कोई मृत्यु नहीं, जिसका कोई जन्म नहीं।

श्वेतकेतु लौटा वापस, अध्ययन करके समस्त शास्त्रों का। जो भी जानने योग्य था, जान आया। निश्चित ही, जानने की अकड़ आ गई। जब वह गांव के भीतर प्रविष्ट हुआ, उसके पिता ने देखा अपने मकान से, श्वेतकेतु अकड़ा हुआ चला आ रहा है। पंडित की अकड़! आया, तो पिता ने कहा कि मालूम होता है, तू सब जानकर आ गया! श्वेतकेतु ने कहा, सब जानकर आ गया जो भी जानने के लिए था। जितनी विद्याएं थीं, सब सीख आया हूं।

उसके पिता ने कहा, बस, एक सवाल तुझसे मुझे पूछना है। तूने उसे भी जाना या नहीं, जिससे सब जाना जाता है? उसने कहा, यह तो कोई विद्या मैंने सुनी नहीं! मेरे गुरु ने इसके बाबत कोई बात नहीं की!

तो उसके पिता ने कहा, तू वापस लौट जा। तू उसको जानकर लौट, जिसे बिना जाने सब जानना बेकार है। और जिसे जान लेने से सब जान लिया जाता है। श्वेतकेतु वापस लौट गया।

ब्रह्म—विद्या का अर्थ वह विद्या है, जिससे हम उसे जानते हैं, जो सब जानता है। गणित आप जिससे जानते हैं, फिजिक्स आप जिससे जानते हैं, केमिस्ट्री आप जिससे जानते हैं, उस तत्व को ही जान लेना ब्रह्म—विद्या है। जानने वाले को जान लेना ब्रह्म—विद्या है। शान के स्रोत को ही जान लेना ब्रह्म—विद्या है। भीतर जहां चेतना का केंद्र है, जहां से मैं जानता हूं आपको, जहां से मैं देखता हूं आपको; जिससे मैं देखता हूं उसे भी देख लेना, उसे भी जान लेना, उसे भी पहचान लेना, उसकी प्रत्यभिज्ञा, उसका पुनर्स्मरण ब्रह्म—विद्या है। कृष्ण कहते हैं, विद्याओं में मैं ब्रह्म—विद्या हूं।

इसलिए भारत ने फिर बाकी विद्याओं की बहुत फिक्र नहीं की। भारत के और विद्याओं में पिछड़े जाने का बुनियादी कारण यही है। भारत ने फिर और विद्याओं की फिक्र नहीं की, ब्रह्म—विद्या की फिक्र की।

लेकिन उसमें अड़चन है, क्योंकि ब्रह्म—विद्या जानने को कभी लाखों—करोड़ों में एक आदमी उत्सुक होता है। पूरा देश ब्रह्म—विद्या जानने को उत्सुक नहीं होता। और भारत के जो श्रेष्ठतम मनीषी थे, वे ब्रह्म—विद्या में उत्सुक थे। और भारत का जो सामान्यजन था, उसकी कोई उत्सुकता ब्रह्म—विद्या में नहीं थी। उसकी उत्सुकता तो और विद्याओं में थी। लेकिन सामान्यजन और विद्याओं को विकसित नहीं कर सकता। विकसित तो परम मनीषी करते हैं, और परम मनीषी उन विद्याओं में उत्सुक ही न थे।

इसलिए भारत ने बुद्ध को जाना, महावीर को, कृष्‍ण को, पतंजलि को, कपिल को, नागार्जुन को, वसुबंधु को, शंकर को जाना भारत ने। ये सारे के सारे, इनमें से कोई भी आइंस्टीन हो सकता है। इनमें से कोई भी प्लांक हो सकता है। इनमें से कोई भी किसी भी विद्या में प्रवेश कर सकता है। लेकिन भारत का जो श्रेष्ठतम मनीषी था, वह परम विद्या में उत्सुक था। और भारत का जो सामान्यजन था, उसकी तो परम विद्या में क्या उत्सुकता हो सकती है! उसकी उत्सुकता दूसरी विद्याओं में है। लेकिन वह विकसित नहीं कर सकता। विकसित तो परम मनीषी करते हैं।

पश्चिम में दूसरी विद्याएं विकसित हो सकी, क्योंकि पश्चिम के जो बड़े मनीषी हैं, वे और विद्याओं में उत्सुक हैं। इसलिए एक अदभुत घटना घटी। पश्चिम ने सब विद्याएं विकसित कर लीं और आज पश्चिम को लग रहा है कि वह आत्म— अज्ञान से भरा हुआ है।

और पूरब ने आत्म—ज्ञान विकसित कर लिया और आज पूरब को लग रहा है कि हमसे ज्यादा दीन और दरिद्र और भुखमरा दुनिया में कोई भी नहीं है।

हमने एक अति कर ली, परम विद्या पर हमने सब लगा दिया दांव। उन्होंने दूसरी अति कर ली। उन्होंने आत्म—विद्या को छोड्कर बाकी सब विद्याओं पर दांव लगा दिया। बड़ी उलटी बात है। वे आत्म—अज्ञान से पीड़ित हैं और हम शारीरिक दीनता और दरिद्रता से पीड़ित हैं।

यह जो परम विद्या है, इस परम विद्या और सारी विद्याओं का जब संतुलन हो, तो पूर्ण संस्कृति विकसित होती है। इसलिए न तो पूरब और न पश्चिम ही पूर्ण संस्कृतियां विकसित कर पाए। फिर भी अगर चुनाव करना हो, अगर फिर भी चुनाव करना हो, तो परम विद्या ही चुनने जैसी है, सारी विद्याएं छोड़ी जा सकती हैं। क्योंकि और सब पाकर कुछ भी पाने जैसा नहीं है।

कृष्ण कहते हैं, मैं परम विद्या हूं सब विद्याओं में।

लेकिन यह बात आप ध्यान रखना, और विद्याओं का वे निषेध नहीं करते हैं, और विद्याओं में जो श्रेष्ठ है, उसकी सूचना भर दे रहे हैं। वे यह नहीं कह रहे हैं कि सिर्फ अध्यात्म—विद्या को खोजना है, बाकी सब छोड़ देना है।

यह भी सोचने जैसा है कि अध्यात्म—विद्या परम विद्या तभी हो सकती है, जब दूसरी विद्याएं भी हों। नहीं तो वह परम विद्या नहीं रह जाएगी। आप कोई मंदिर का अकेला सोने का शिखर बना लें और दीवालें न हों, तो समझ लेना कि शिखर जमीन में पड़ा हुआ लोगों के पैरों की ठोकर खाएगा। मंदिर का स्वर्ण—शिखर आकाश में उठता ही इसलिए है कि पत्थर की दीवाले उसे सम्हालती हैं। अध्यात्म—विद्या का शिखर भी तभी सम्हलता है, जब और सारी विद्याएं दीवालें बन जाती हैं और उसे सम्हालती हैं।

अब तक हम कहीं भी मंदिर नहीं बना पाए। हमने शिखर बना लिया, पश्चिम ने मंदिर बना लिया। जब तक हमारा शिखर पश्चिम के मंदिर पर न चढ़े, तब तक दुनिया में पूर्ण संस्कृति पैदा नहीं हो सकती।

और अंतिम बात।

कृष्ण ने कहा, एवं परस्पर विवाद करने वालों में तत्व—निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद, तर्क, न्याय मैं हूं।

तर्क दो तरह के हैं। एक तो तर्क है, जिसमें हम दूसरे को गलत सिद्ध करना चाहते हैं। वह क्या कह रहा है, उससे कोई संबंध नहीं है। दूसरे को गलत करना चाहते हैं, वह क्या कह रहा है, उससे कोई संबंध नहीं है। एक तो तर्क है, जिसमें हम अपने अहंकार को सिद्ध करना चाहते हैं, दूसरे को गलत करना चाहते हैं।

इसलिए कई दफा ऐसा होता है कि आपकी ही बात भी अगर दूसरा कह रहा हो, तो भी आप उसको गलत सिद्ध किए बिना नहीं मान सकते। दूसरा सदा गलत होता है! होना चाहिए। आप सदा सही हैं। अपने लिए आप कुछ भी तर्क का उपयोग करते हैं। लेकिन यह सत्य की जिज्ञासा से नहीं, यह केवल अहंकार की तृप्ति के लिए है। ऐसा तर्क भ्रष्ट तर्क है। इसको भारत कुतर्क कहता है। यह कितना ही विकसित हो जाए, इससे कोई मनुष्य के जीवन में रूपांतरण नहीं होता।

एक और तर्क भी है, जो हम सत्य की खोज के लिए करते हैं। तब यह सवाल नहीं है कि दूसरा गलत कह रहा है। तब सवाल यह है कि सही क्या है? कौन कह रहा है, यह मूल्यवान नहीं है। क्या है सही, यही मूल्यवान है। कोई भी सही कह रहा हो, तो हम तर्क की कोशिश करते हैं, उस सही की जांच के लिए। तर्क तो एक कसौटी है। जैसे कोई सोने को कसता है कसौटी पर, ऐसे ही तर्क विचार की क्षमता, निर्णय और निर्णय का शास्त्र एक कला है। उस पर कसना है, कि जो भी कहा जा रहा है, वह कितने दूर तक सही है।

लेकिन हम नहीं कस पाते, क्योंकि हम सही को तो पहले से ही जानते हैं! हम सब मानते हैं कि सत्य तो हमें पता ही है। इसलिए अगर दूसरा हमसे मेल खा रहा है, तो सही है। और अगर हमसे मेल नहीं खा रहा है, तो गलत है। हम कसौटी हैं।

हम कसौटी नहीं हो सकते। तर्क कसौटी है। और तर्क तो बिलकुल निष्पक्ष कसौटी है, अपने को भी उसी पर कसो और दूसरे को भी उसी पर कसो। और डबल बाइंड, दोहरा चित्त न हो, दूसरे के लिए कुछ और, हमारे लिए कुछ और।

सुना है मैंने, एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन अपने घर के बाहर बैठा है। और गांव का जो मौलवी है, वह मस्जिद से नमाज पढ़कर लौट रहा है। अचानक बरसा आ गई, तो वह तेजी से भागा। मुल्ला ने कहा कि ठहरो! शर्म नहीं आती, धार्मिक आदमी होकर और भागते हो? वह मौलवी भी थोड़ा घबड़ाया कि धार्मिक आदमी होने से। भागने का क्या लेना—देना! उसने कहा, क्या मतलब? मुल्ला ने कहा, परमात्मा पानी बरसा रहा है और तुम भागकर परमात्मा का अपमान कर रहे हो? किसका पानी है यह? यह जल किसका है?

मौलवी भी डर गया, और अपनी इज्जत की रक्षा के लिए और पड़ोसियों को पता न चल जाए कि परमात्मा के पानी का अपमान हुआ; वह आहिस्ता—आहिस्ता घर पहुंचा, तरबतर पानी में। सर्दी पकड़ गई, बुखार आ गया, निमोनिया हो गया।

तीन दिन बाद वह अपनी खिड़की में बैठा है अपनी दुलाई ओढ़े हुए। देखा कि नसरुद्दीन बाजार से लौट रहा है। पानी की थोड़ी—सी बूंदें आईं। नसरुद्दीन भागा। उस मौलवी ने चिल्लाकर कहा कि ठहर नसरुद्दीन! भगवान का अपमान कर रहा है? नसरुद्दीन ने कहा कि नहीं; भगवान का पानी गिर रहा है, कहीं मेरा पैर उस पर न पड़ जाए और अपमान न हो जाए, इसलिए घर जा रहा हूं!

यह डबल बाइंड माइंड है। इसमें तर्क सदा अपने लिए है। इसमें सचाई से कोई प्रयोजन नहीं है। सदा तर्क अपने लिए है।

कृष्‍ण कहते हैं, वैसा मैं तर्क नहीं हूं। सत्य के निर्णय के लिए जो आतुर हैं, सत्यनिष्ठ, जिन्हें इससे प्रयोजन नहीं है कि पक्ष में पड़ेगा कि विपक्ष में, मैं हारूंगा कि जीतूंगा; जिन्हें प्रयोजन इतना है कि सत्य क्या है, उसकी परख हो जाए, उसका पता चल जाए; ऐसे सत्य के लिए किया गया वाद, ऐसे सत्य की जिज्ञासा के लिए किया गया तर्क मैं हूं।

इसलिए भारत में तर्क को हमने एक बहुत ही और ढंग से लिया। यूनान ने तर्क को विकसित किया, लेकिन सोफिस्ट्री की तरह। यूनान में स्कूल थे सोफिस्टों के, जो लोगों को तर्क करना सिखाते थे पैसे लेकर। कोई भी फीस दे दे, वह छह महीने, साल भर, दो साल में तर्क की शिक्षा दे देंगे। तर्क की शिक्षा का मतलब यह था कि तुम किसी को भी हराना चाहो, तो हरा सकते हो। किसी को भी। यह सवाल नहीं है कि किसको हराना है। तुम्हें हम तरकीबें सिखा देते हैं, इनमें तुम किसी को भी फंसा ले सकते हो, कोई भी हार जाएगा।

एक बहुत बड़ा सोफिस्ट था, जीनो। जीनो ने घोषणा कर रखी थी कि किसी को भी हराना हो, तो मैं तर्क की शिक्षा देता हूं। और वह इतना आश्वस्त था कि जब भी वह किसी विद्यार्थी को लेता था अपनी तर्क की शिक्षा के लिए, तो उससे आधी फीस लेता था। और कहता था, आधी तब देना, जब तुम किसी से तर्क में जीत जाओ।

एक विद्यार्थी आया, अरिस्तोफेनीज, और उसने आधी फीस दी, और गुरु से शिक्षा ली दो साल। और दो साल के बाद गुरु राह देखने लगा कि वह किसी से तर्क में जीते, तो आधी फीस ले ले।

लेकिन अरिस्तोफेनीज ने उस दिन से किसी से विवाद ही नहीं किया। यहां तक कि अगर उससे कोई कहे दिन में भी कि रात है, तो वह कहे, हां। क्योंकि अगर वह जीत जाए, तो वह आधी फीस चुकानी पड़े।

जीनो बड़ी मुश्किल में पड़ गया। उसने कहा, यह तो लड़का कुछ ज्यादा चालबाज है! जीनो के शिष्य ने, अरिस्तोफेनीज ने कहा कि मैं फीस देने वाला नहीं हूं, जब तक मैं जीतू न। और जीतने का कोई कारण नहीं, क्योंकि मैं हर हालत में सरेंडर कर देता हूं। कोई कुछ भी कहे, हां! मैं न कहता ही नहीं, विवाद होगा ही नहीं, जीत का सवाल नहीं है।

लेकिन गुरु भी ऐसे हार नहीं मान सकता था। उसने अदालत में मुकदमा चलाया। उसने अदालत में मुकदमा चलाया, और अपील की अदालत से कि यह मेरी आधी फीस नहीं चुकाया है, वह मुझे मिलनी चाहिए। इसकी शिक्षा पूरी हो गई।

और उसकी तरकीब यह थी कि अदालत तो कहेगी कि यह अभी पैसा नहीं चुकाएगा, क्योंकि अभी शर्त पूरी नहीं हुई। यह अभी पहला विवाद नहीं जीता है। तो जीनो का खयाल था कि मैं अरिस्तोफेनीज से कहूंगा कि अदालत ने तुझे जिता दिया, तू पहला विवाद जीत गया। आधी फीस मुझे दे दे। अगर अदालत निर्णय देगी अरिस्तोफेनीज के पक्ष में कि अभी फीस नहीं दी जा सकती, तो भी मैं फीस ले लूंगा, क्योंकि वह जीत गया, पहला विवाद जीत गया। लेकिन अरिस्तोफेनीज भी उसी का शिष्य था। उसने कहा, अगर अदालत कहेगी कि तुम जीत गए, तब तो मैं पैसा देने वाला नहीं हूं क्योंकि मैं अदालत से प्रार्थना करूंगा कि इसमें अदालत का अपमान है। और अगर मैं हार गया, तब तो देने का सवाल ही नहीं है। क्योंकि पहला ही विवाद हार गया।

अदालत ने फैसला भी दे दिया कि अरिस्तोफेनीज को पैसा देने की जरूरत नहीं है, क्योंकि अभी उसने कोई विवाद ही नहीं किया, जीत का कोई सवाल नहीं है।

बाहर आते ही जीनो ने कहा, अरिस्तोफेनीज, अब पैसा दे दो, क्योंकि तुम पहला विवाद अदालत में मुझसे जीत गए। अरिस्तोफेनीज ने कहा कि गुरु, मैं आपका ही शिष्य हूं। आप भूल जाते हैं। मैं अदालत का अपमान कभी भी नहीं कर सकता, चाहे मेरे प्राण चले जाएं!

यह सोफिस्ट्री है। सोफिस्ट्री का मतलब होता है, वितंडा। उसमें आप कुछ भी कर सकते हैं। और दोनों तरफ तर्क चल सकते हैं।

कृष्‍ण कहते हैं, ऐसे तर्क नहीं, लेकिन वह तर्क जो सत्य की खोज के लिए किया जाता है। तो मैं वाद, सत्य के खोजियो के लिए किया जाने वाला वाद हूं।

क्रमशः ........)

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