उत्तरी सीरिया इस समय जंग का मैदान बना हुआ है।

उत्तरी सीरिया इस समय जंग का मैदान बना हुआ है। एक समय सीरिया और उसके आस पास आर्यों का राज हुआ करता था। जिसे मितानी साम्राज्य कहते थे। यह साम्राज्य आज से लगभग 3500-3700 साल पहले हुआ करता था। इस संबंध में थोड़ी चर्चा इतिहास शोधार्थी और शिक्षक अंकित जायसवाल जी ने भी अपने पिछले लेख में अभी की थी। मितानी शब्द की उत्पत्ति मित् शब्द से हुई है। मित् शब्द प्रोटो इंडो यूरोयन भाषा का महत्वपूर्ण शब्द है जिसका अर्थ सतत रूप से हर जगह मिलने अथवा अपनाने से है। इसी मित् शब्द से मित्र, मीत, मितवा शब्द बनें हैं। अंग्रेज़ी में मीट, मेट, मीटिंग, मेटिंग शब्द बने हैं। जब अलग अलग लोग एक हो जाते है तब यह शब्द प्रयुक्त होता है। माना जाता है कि मित्तानी शब्द वहाँ पर आर्यों के एकीकरण से बना। उस साम्राज्य के महत्वपूर्ण राजाओं में से एक राजा था दशरथ (तृषरथ), उसको उसके पिता के हत्या के बाद वहाँ की राजगद्दी पर बैठाया गया उसके बाद मितानी साम्राज्य ने अगल बगल के राज्यों से संधियाँ की ताकि साम्राज्य को स्थिरता मिल सके। उस दौरान उन्होंने संधियों में साक्षी के रूप में मित्र, वरुण, इंद्र और अश्विनी कुमार आदि देवताओं को अपने किलाक्षर लिपि में दर्ज किया है। इस राजा ने अपने बहन और बेटी दोनों को तत्कालीन मिश्र के राजा (फ़रोआ) के पास भेजा और उनका विवाह करा दिया और बदले में संरक्षण और खूब सारे सोने की माँग की। 

मितानी समाज ने रथ के संबंध में बहुत महत्वपूर्ण खोज कर डाले थे। उनका सबसे महत्वपूर्ण अश्व प्रशिक्षक था किक्कुली जिसने एक हज़ार से अधिक लाइनों में घोड़ों के प्रशिक्षण का मैन्युअल तैयार किया था और कुल 214 दिनो का यह ट्रेनिंग प्रोग्राम होता था जिसमें घोड़ों को धीमी गति, मध्यम गति और चौकड़ी तीनों प्रकार की ट्रेनिंग होती थी। घोड़ो का तीन प्रकार का व्यायाम था जिससे क्रमशः वह अपने मसल को मज़बूत करते थे, हृदय गति को ठीक रखते थे और अंत में अपने रिफ़्लैक्सेज़ को ठीक करते थे। रथ के मामले में इस समाज ने जो नई खोज की थी वह था रथों में सॉलिड पहिए के बजाय तीली लगाकर उसके वजन को हल्का बना देना ताकि रथ के रफ्तार को बढ़ाया जा सके। 

इनके समाज में वर्ण व्यवस्था बिलकुल राजा जमशेद द्वारा बनाये गए तंत्र के ही अनुसार थी। आर्यों के ईरानी शाखा के चौथे राजा जमशेद ने समाज को चार वर्णों में, जिसे अवेस्ता की भाषा में वरस कहा जाता है, विभाजित किया था ये क्रमशः थे अथर्वन (ब्राह्मण), रथेस्तरान (क्षत्रिय), वास्तेरयोसन (वैश्य) और हुतोख़्शन (शूद्र)। जनेऊ संस्कार भारतीय आर्यों और ईरानी आर्यों दोनों में पाया जाता था/ है। जो संभवतः मितानी साम्राज्य में भी किया जाता था। 

लेकिन कुछ एक अंतर ईरान और भारत के जनेऊ संस्कार में महत्वपूर्ण था। हालांकि दोनों ही सफेद धागे का प्रयोग करते है लेकिन जहाँ भारतीय आर्य इसे कंधे से पहनते हैं वहीं ईरानी आर्य इसे कमर में धारण करते हैं। इसी प्रकार दोनों में इस बात पर सहमति है कि समझ विकसित होने पर जनेऊ होना चाहिए लेकिन ईरानी आर्य नियम से इसे पंद्रह साल पर करते हैं/ थे, जबकि भारतीय आर्यों में समय फिक्स नहीं है। भारत में जनेऊ के बाद व्यक्ति को द्विज अर्थात दूसरा जन्म प्राप्त करने वाला कहा जाता है वही ईरानी आर्यों में भी इसे नवजोत अर्थात नया जीवन प्रकट करने वाला ही कहते हैं। हाँ, ईरानी धर्मग्रंथ जो नौवी शताब्दी तक लिखे गए वह जनेऊ करने में वर्ण और लिंग के आधार पर भेद नहीं करते लेकिन बाद के भारतीय ग्रंथों में अलग अलग प्रकार के विचार हैं।

कहने का अर्थ यह है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता चाहे भौगोलिक सीमा से संबंधित हो या समय सीमा से संबंधित हो, बहुत ही विशाल है और भारत को समझने के लिए ईरान एवं ज़ोरस्ट्रेसियन धर्म को समझना अनिवार्य है।

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