अहंकार झूठ है; मस्तिष्क की कोशिकाएं झूठ नहीं हैं

"अहंकार झूठ है; मस्तिष्क की कोशिकाएं झूठ नहीं हैं। अहंकार झूठ है, स्मृतियां झूठ नहीं हैं। अहंकार झूठ है, विचार की प्रक्रिया झूठ नहीं है।विचार की प्रक्रिया सच है। स्मृतियां सच है; मस्तिष्क की कोशिकाएं सच है; तुम्हारा शरीर सच है।
 तुम्हारा शरीर सच है और तुम्हारी आत्मा सच है।
 यह दो सच हैं।
 लेकिन जब आत्मा का शरीर से तादात्म्य हो जाता है तो अहंकार निर्मित होता है: वह अहंकार झूठ है।"
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प्रकृति और पुरुष अनादि हैं।शिव और शक्ति कह सकते हैं।ये सदा हैं।
पुरुष 'होने" की तरह है,चेतन है।
प्रकृति शरीर, मस्तिष्क आदि सब है।
इन दोनों को जोडने वाला अहंकार झूठ है।
मानस में बड़ी सुंदरता से कहा है-
जड चेतन में ग्रंथि बन गयी है।यह ग्रंथि वास्तविक नहीं है फिर भी बड़ी मुश्किल से छूटती है।
इसका मतलब छूट तो सकती है।हम सबका मुख्य कार्य यही है।जब तक इसे छोड़कर हम अन्य कार्यों में व्यस्त हैं, उन्हें समस्या बनाकर चलते हैं, उन्हें सुलझाना चाहते हैं तब तक वास्तविक , आधारभूत समाधान संभव नहीं है।
इसलिए महर्षि कहते हैं -पहले इस समस्या को सुलझा लो कि मैं कौन हूं?बाद में अन्य समस्याओं को सुलझाना आसान होगा।
दो चीजें हैं -जड और चेतन।
शरीर और होना।
इन दोनों में हम चेतन हैं।'होना' हमारा स्वरुप है।ईश्वर अंश,चेतन अंश इसी दृष्टि से है।
हम जड नहीं हैं,चेतन हैं।
अब जड चेतन के बीच ग्रंथि बन जाती है -अहंकार की, अहम्मन्यता की, हमें लगता है यही हम हैं।और इसी हिसाब से हम चलते हैं।
विचार प्रक्रिया भी चलती है मस्तिष्क में।हम इससे तंग भी आ जाते हैं। लेकिन वह प्रकृति है।वह अपना कार्य करती है।
हम अलग हैं -होना हमारा स्वरुप है,मौन हमारा स्वरुप है।
होने और विचार प्रक्रिया का तादात्म्य हो जाता है। दोनों मानों एक हो जाते हैं।
इससे अहंकार उत्पन्न होता है।
है यह मैं विचार।यह विचार प्रक्रिया का हिस्सा है।
हमारा स्वरुप 'होना' है, विचार प्रक्रिया से हमारा स्वरुप अलग है।
जब होना और विचार प्रक्रिया जुड जाते हैं, मैं विचार केंद्र बन जाता है,कर्ताभोक्ता हो जाता है।
हम अपने मौन होना स्वरूप को मैं विचार मानकर कर्ताभोक्ता भाव से सोचने, करने लगते हैं।
इसलिए कहा जाता है तुम जड नहीं,चेतन हो।
तत्त्वमसि।
यह सच है।
सवाल यह है कि हम अपने शुद्ध होने को भूलकर ,शरीर से-विचार से जुडकर अहंग्रंथि कैसे हो जाते हैं?
इसका कारण माया बताया है। मैं अरु मोर तोर तें माया। जेहिं बस कीन्हें जीव निकाया।।
इस मैं मेरा की माया ने उन जीवों को फंसा रखा है जो महान ईश्वर अंश हैं, सतचित आऩंदस्वरुप हैं।
क्या यह स्वयं से कार्यरत है? क्यों इसे खोजने पर लुप्त हो जाता है?
गीता ने अहंकारविमूढात्मा कहा है। अर्थात् जो चेतन है वह अहंमूर्छा से मूर्छित है।
आत्मा मूर्छित हो नहीं सकता। प्रकाश ,अंधेरा हो नहीं सकता।
इसका मतलब भ्रम हो गया है।
आधार 'होना' है। क्यों कि भ्रम जड को नहीं हो सकता,भ्रम के लिए चेतन की आवश्यकता होती है।चेतन भ्रमित हो सकता है,जड भ्रमित नहीं होता।
चेतन को ही पता लगाना है कि मैं चेतन हूं,जड नहीं हूं।
मैं कौन हूं प्रश्न अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए है।
हमें लगता है हम शरीर हैं, मस्तिष्क की कोशिकाएं हैं, स्मृति हैं, विचार प्रक्रिया हैं।
सत्य को जान लें तो शुद्ध चेतन के रूप में हम मौन ही हो जायेंगे। अखंड मौन।
विचार प्रक्रिया चलेगी लेकिन उससे कोई हानि नहीं।
विचार प्रक्रिया से जुडे हुए हैं,बेहोश हैं तथा विचार प्रक्रिया नकारात्मक है तो बडा मुश्किल है। क्रोधक्षोभ, भयचिंता की वृत्तियां बेहद कष्ट देती हैं।
यदि हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान कर अखंड मौन हो जाते हैं तो क्रोधक्षोभ, भयचिंता आदि वृत्तियां अलग हो जाती हैं।वे अभिव्यक्त हो सकती हैं लेकिन हम अपने स्वरूप में स्थित होते हैं इसलिए उनसे अर्थात् प्रकृति से कोई शिकायत नहीं होती।
उनसे जुडकर,बेहोश होकर झूठे कर्ताभोक्ता होने से सारी तकलीफें हैं।
प्रश्न है तब क्या हम अहंग्रंथि के द्रष्टा हो जाते हैं?
दर असल में सारी संक्रमण काल की बातें हैं।
हम स्वयं शुद्ध चेतन होते हुए भी अहंग्रंथि बन जाते हैं।
यह झूठी इसलिए है क्योंकि यह जड और चेतन को मिलाकर बनी है।इसे दोनों का सहारा चाहिए।
जड न हो तो अहंग्रंथि कैसे बनेगी,चेतन न हो तो अहंग्रंथि कैसे बनेगी?
दोनों चाहिए और दोनों अलग-अलग हैं,एक नहीं हैं।
यह हम जान लें तथा हम स्वयं चेतन की तरह रह सकें तथा जड को जड की जगह रहने दें तब कोई समस्या नहीं है।
हम मौन हमारे शुद्ध स्वरूप में स्थित रहें।इस कारण से महात्माओं ने बताया-
'चुप साधन चुप साध्य है चुपमा चुप समाय।
चुप समझ्या री समझ है समझ्या चुप व्हे जाय।।'
सिर्फ अपने आपमें रहना है मौन होकर। शरीर की चिंता नहीं लेनी है।
" यह मत सोचो कि शरीर झूठ है, वह सच है। वैसे ही मस्तिष्क की कोशिकाएं सच हैं, विचार प्रक्रिया सच है।
 सिर्फ चेतना और विचार प्रक्रिया का तादात्म्य झूठ है।
वह एक गांठ है ;तुम उसे खोल सकते हो। और जिस क्षण तुम उसे खोलते हो, तुमने द्वार खोल दिया।"
विचार प्रक्रिया हमसे अलग है। मैं विचार भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन हम मैं को एक विचार प्रक्रिया के हिस्से की तरह कहां देखते हैं,हम ही मैं विचार बनकर अन्य विचारों से उलझ जाते हैं।
आदमी अपने विचारों में उलझा है क्योंकि वह मैं विचार बनकर सोच रहा है।
मैं विचार, विचार प्रक्रिया का हिस्सा बना रहे इसमें कोई हर्ज नहीं,तब भी हम अपने शांत,मौन,चेतन आत्मस्वरुप में रह सकते हैं लेकिन हमारा आत्मस्वरुप ही मैं विचार में खो कर मैं मैं करने लगे, अहंकार माया से विमूढ होकर अहंकारी हो जाय तो निसंदेह बड़ी भारी भटकन है।
अहंकारी होने में खतरा है।इस बेहोश स्थिति में रहकर ही हम सारी तकलीफें उठा रहे हैं।
अहंकार कहे -मैं दुखी हूं।
इसे पहचाना जा सके तो ठीक है।हम अपने स्वरूप में हैं,सुखदुख से कोई संबंध नहीं।
 हम ही अहंग्रंथि बन जाते हैं जिसने जड चेतन दोनों को जोड रखा है तब दुख भोगना ही है।
कृष्ण कहते हैं गीता में -
'प्रकृति में स्थित पुरुष सुखदुखों का भोक्ता है।'
पुरुष है शुद्ध चेतन,होना मात्र,
प्रकृति है शरीर, मस्तिष्क की कोशिकाएं, स्मृति, विचार प्रक्रिया आदि।
दोनों अलग-अलग हैं।
जब पुरुष अपने शुद्ध होने को भूलकर प्रकृति की चीजों के लिए मैं,मेरा,मुझे,मेरे लिए,मेरे बारे में इस तरह के शब्दों का प्रयोग करता है तब वह प्रकृति में स्थित होकर सुखदुख भोगता है।
जानना यह है कि चेतन हम भी हैं और जड शरीर, मस्तिष्क आदि भी हैं लेकिन कहीं हम उनके लिए "मैं मेरा" आदि शब्दों का प्रयोग तो नहीं कर रहे हैं क्योंकि वह माया है।
'मैं अरु मोर तोर तें माया।
जेहिं बस कीन्हें जीव निकाया।।'
बिना मैं मेरा,तू तेरा शब्दों के जब हमारे स्वरूप में हमारी अखंड मौन स्थिति होती है तब भी प्रकृति मौजूद होती है अपने दल बल के साथ मगर हम स्वतंत्र होते हैं।
यह प्रकृति स्वतंत्र लोगों का स्वागत करती है।वे उसका सदुपयोग करने में सक्षम होते हैं।
जो मैं मेरा करके प्रकृति से बंधा है वह तो स्वार्थ का गुलाम बनकर ही जीता है।न वह किसीके हित की परवाह करता है।उसकी स्मृतियों में मैं मेरा की प्रधानता है।
जो मैं मेरा रहित शुद्ध होना मात्र है, स्मृतियां वहां भी होती हैं मगर हानिकारक नहीं होतीं।
सभी हैं।विश्व भरा पडा है लोगों से, चीजों से। क्या तकलीफ है उसे जो समझता है 'जीओ और जीने दो' सूत्र को?

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