एक राष्ट्र के अति धनाढ्य नेता नाम नही ले सकती

एक राष्ट्र के अति धनाढ्य नेता (नाम नहीं ले सकती; कार्यक्षेत्र की कुछ सीमाओं से बंधी हूँ) के पदग्रहण के तुरंत पश्चात् दर्जनो आदेश पारित किए, जिसे देखकर राष्ट्रवादी लहालोट हो रहे है। उसे आधार बनाकर प्रधानमंत्री मोदी पर कटाक्ष भी कर रहे है। 

सर्वप्रथम, यह समझना आवश्यक है कि नेता वही कार्यकारी आदेश साइन कर रहे है जिससे उनके पूर्ववर्ती नेता के कार्यकारी आदेशों को निरस्त किया जा सके।  महत्वपूर्ण यह है कि ऐसे किसी भी आदेश का पालन नेता के कार्यकाल तक सीमित होता है।  अगर किसी अन्य पार्टी का नेता आ गया, तो ऐसे सारे आदेश कूड़ेदान में डाल दिए जाएंगे। 

फिर किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में चेक्स एंड बैलेंसेस (checks and balances) होता है। अगर फेडरल (केंद्र) व्यवस्था कोई आदेश पारित करती है, तो उसे राज्य लागू करने से मना कर सकता है।  इस राष्ट्र के दो सर्वाधिक धनी राज्य विपक्ष के पास है; एक राज्य की जीडीपी भारत के समकक्ष है। फिर इन आदेशों को कोर्ट में चुनौती दी जायेगी। 

इस राष्ट्र में जन्म से नागरिकता मिलना संविधानिक अधिकार है। इसे नेता जी अपने आदेश से नहीं कैंसल कर सकते है। जन्म से नागरिकता निरस्त करने वाले आदेश को कोर्ट से स्टे मिल गया है; अन्य 22 राज्यों में कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है। यद्यपि राष्ट्र के सर्वोच्च न्यायालय में नेता जी के दल द्वारा नियुक्त किये न्यायाधीशों का विशाल बहुमत है, जो नेता जी के आदेशों का समर्थन कर सकते है; फिर भी सर्वोच्च न्यायालय तक अत्यधिक कम केस पहुंचते है। अगली समस्या आएगी संसद से कानून पारित करवाने में। यद्यपि बहुमत है, लेकिन "राज्य सभा" जैसे सदन में सुपर मेजोरिटी (नेट पर सर्च करके पढ़ सकते है) नहीं है। अधिकतर कानून को "राज्य सभा" वाले सदन में विपक्ष आगे नहीं बढ़ने देने में सक्षम है। 

सरकारी व्यय कम करना - इस देश में कदाचित ही ऐसा बाबू मिले जो बेगारी कर रहा हो।  कोई चतुर्थ श्रेणी नहीं है।  केवल प्रोफेशनल एवं सपोर्ट स्टाफ होते है। पांच या छह प्रोफेशनल के मध्य एक सपोर्ट स्टाफ होता है। इस देश में अधिकतर जेल निजी क्षेत्र में है। रेलवे निजी है। बिजली उत्पादन एवं वितरण निजी है। यहाँ तक कि सरकारी कर्मियों की पेंशन भी निजी क्षेत्र में है। बैंक निजी है। स्वास्थ्य व्यवस्था निजी है। कूड़ा निष्पादन निजी है। यहाँ तक कि डिफेन्स के कई कार्य (जैसे कि फौजियों की  भोजन व्यवस्था) निजी क्षेत्र में है। आप केवल केंद्र के सरकारी कार्यालय बंद कर सकते है; स्टाफ की संख्या कम कर सकते है।  लेकिन फिर वही कार्य आउटसोर्सिंग (किसी वाह्य एजेंसी) से करवाना होगा। दूसरे शब्दों में, सरकारी व्यय कम करने का केवल स्लोगन है; जब धरातल पर ठोस कार्यान्वन (2 ट्रिलियन डॉलर कम करने का वादा है) होगा, तब संवाद आगे बढ़ाएंगे। 

निश्चित रूप से, घुसपैठियों को वापस भेजा जाना चाहिए। लेकिन इस मामले में आंशिक सफलता ही मिलनी है, वह भी कई बिलियन डॉलर व्यय करके। 

बच्चो से सेक्स के अपराधी, संसद के अंदर पुलिस कर्मियों पर हमला करने वाले दंगाई, ठग, भ्रष्टाचारी, तथा जबरन वसूली करने वाले, जिन्हें इस राष्ट्र के न्यायाधीशों द्वारा दोषी ठहराया गया था, उन्हें नेता जी ने पहले ही दिन क्षमादान दे दिया। इनके पूर्व वाले नेता जी भी यही कर चुके है। 

क्या आप भारत में भी यही चाहते है कि पार्टी के आधार पर न्यायाधीशों द्वारा दोषी पाए गए अपराधियों को बरी कर दिया जाए? अगर राहुल या कजरी केंद्र में आ जाए और उमर खालिद या यासीन मालिक को रिहा कर दे, तो आपको कैसा लगेगा? या फिर, 370 को एक आदेश से वापस ले आए (यह संभव नहीं है, लेकिन आदेश इश्यू  करने में क्या जाता है? अगले पक्ष के कट्टर समर्थक प्रसन्न हो जाएंगे)?

फिर इस नेता की नीतियों के कुछ परिणामो पर भी विचार करते है। अन्य देशो पर टैरिफ या तटकर लगाने के बाद मंहगाई बढ़नी ही है क्योकि इस देश में मैन्युफैक्चरिंग लगभग नगण्य है। कुछ ही समय में मुद्रा नीति (रिज़र्व बैंक) एवं वित्तीय नीतियों (सरकारी) में टकराव होगा। केंद्र के अलावा राज्य भी आयकर लेते है। 

राष्ट्र की जीडीपी 29 ट्रिलियन डॉलर है, जबकि उधारी 36 ट्रिलियन की है। राजकोषीय घाटा 6 प्रतिशत से अधिक है। यह एक ऐसी भयावह स्थिति है जो केवल इस राष्ट्र के लिए ही नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्टेबिलिटी के लिए एक संकट है। अभी तक के बड़बोलेपन से पता ही नहीं चलता है कि इन दोनों कैसे निपटा जाएगा?

शीघ्र ही फेडरल (केंद्र) एवं राज्य सरकारों में टकराव होगालोकतान्त्रिक अमेरिका का इतिहास देख लीजिये। दो राजनीतिक दल है; इन दोनों के बीच सत्ता ट्रांसफर होती रहती है। डेमोक्रेटिक कार्टर के बाद रिपब्लिकन रीगन-बुश, उनके बाद डेमोक्रेटिक क्लिंटन, फिर रिपब्लिकन बुश, फिर डेमोक्रेटिक ओबामा, उनके बाद रिपब्लिकन ट्रम्प, फिर डेमोक्रेटिक बाइडेन, फिर रिपब्लिकन ट्रम्प। 

एक पार्टी अपनी गोटियां बिछाती है, नीति लागू करती है, तब तक दुसरे दल का समय आ जाता है और वह पुरानी गोटियां हटाकर नयी गोटियां बिछाना शुरू कर देता है। यहां तक कि एक नए राष्ट्रपति को लगभग 2000 सरकारी नियुक्तियों का अधिकार होता है। एक तरह से वह अपनी सोच एवं आइडियोलॉजी वाली टीम प्रशासन में बैठाता है। कदाचित तभी चुनाव परिणाम से शपथ ग्रहण के मध्य लगभग 10 सप्ताह का अंतर होता है।  

यहां तक कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के कुल 9 न्यायाधीशों में से 6 ट्रम्प के समर्थक है, ट्रम्प की रिपब्लिकन सरकार द्वारा पार्टी लाइन पर नियुक्त किये गए है और आरोप लगाया जाता है कि पार्टी लाइन पर निर्णय देते है। यह सभी न्यायाधीश आजीवन अपने पद पर रहते है।  केवल त्यागपत्र या फिर मृत्यु से ही वैकेंसी होती है। सुप्रीम कोर्ट के सभी 9 न्यायाधीश एक साथ केस को सुनते है। कोई सिबल वहां पर किसी विशेष जज को नहीं चुन सकता है। 

अब भारत में क्या हुआ या होता है? स्वतंत्रता के बाद नेहरू परिवार एवं कांग्रेस का एकछत्र शासन लगभग 2014 मई तक चला। कभी वाजपेयी या मोरार जी की सरकार अवश्य बन गयी थी, लेकिन उसमे कोंग्रेसी भरे हुए थे।  वाजपेयी जी के प्रमुख सचिव कोंग्रेसी थे। आरोप लगाया जाता है कि प्रियंका को बिना किसी पद के विशाल सरकारी बंगला वाजपेयी जी के आदेश से मिला, जबकि शहरी विकास मंत्री जगमोहन विरोध कर रहे थे (उस समय मैं शहरी विकास मंत्रालय में ही पोस्टेड था)। 

पिछले तीन दशक से भारतीय उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों, प्रमुख न्यायाधीशों के नामो की संतुस्ती स्वयं न्यायाधीश करते है। और वह सभी न्यायाधीशों के नामो की संतुस्ती एवं नियुक्ति तीन दशक पूर्व कोंग्रेसियों ने की थी।  अर्थात, एक चेन बन गयी है जिसके कारण उच्च न्यायाधीश कुछ सीमित परिवार एवं बैकग्राउंड से आते है। 

तभी कोंग्रेसियों एवं एक परिवार की बिछायी गोटियों (वक्फ, धार्मिक स्थल कानून) को हटाने में या फिर UCC लाने समय लग रहा हैं। 

पहले तो इनमें से कुछ कानूनों को निरस्त करने या लाने में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी (जो अब लोक सभा में नहीं हैं)। फिर, मोदी सरकार के हर ऐसे कार्य को न्यायालय के समक्ष चुनती दी जायेगी, जहाँ न्यायाधीशों का दरवाजा रात्रि को  कुछ विशेष वकील खुलवा सकते हैं। अतः, सरकार को संभल कर चलना होगा।  

रही बात भारत की, तो एक ओर पाकिस्तान, एक ओर चीन बैठा है जिनके साथ स्वतंत्रता के बाद 5 युद्ध हो चुके है। सीमा पर स्थित अन्य राष्ट्रों - अफगानिस्तान, बांग्लादेश एवं म्यांमार में अस्थिरता है। क्या पिछली एक शताब्दी में अमेरिका को मेक्सिको या कनाडा से युद्ध फेस करना पड़ा है?

अब आते है कि नेता जी किस विषय पर चुप्पी साध गए है।  क्या आपने उनके विचार गन वायलेंस के बारे में सुना है? अमेरिका में प्रति वर्ष औसतन 50000 हजार लोगो की मृत्यु गन वायलेंस में हो जाती है। कोई भी किशोर स्कूल में बन्दूक ले आता है और छात्रों को मार देता है। इसके विपरीत, पिछले एक दो दशक में आतंकी हमलो में प्रति वर्ष औसतन  20 लोग मारे जाते है।  

दूसरी चुप्पी, महिलाओ के कोख पर अधिकार को लेकर है। प्रजनन स्वास्थ्य, गर्भपात इत्यादि पर चुप्पी अखरती है। 

तृतीय, इस राष्ट्र में अत्यधिक निर्धनता एवं दरिद्रता भी है (अधिकतर भारतीयों को जानकार आश्चर्य होगा, लेकिन यह तथ्य है)। इस बारे में वह चुप है। 

क्लाइमेट चेंज के बारे में उनके विचार सबको पता है। जो भी जलवायु परिवर्तन का विरोध करता है, नकारता है, वह विज्ञान, अर्थशास्त्र एवं प्रगति के विरोध में खड़ा है। आज जब सोलर एवं वायु से उत्पन्न ऊर्जा, कोयले से उत्पन्न ऊर्जा से सस्ती है, तब पेट्रोल-गैस-कोयला के समर्थन में खड़ा होने को दूरदृष्टि नहीं कहा जा सकता है। 

इस समय विशाल उद्यम, नए उद्यम ग्रीन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में खड़े हो रहे है, वैश्विक आधिपत्य जमा रहे है। यहां तक कि UAE एवं सऊदी अरब के शासक भी इस तकनीकी को दोनों हाथो से अपना रहे है, प्रोमोट कर रहे है।

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