ढाई अक्षर प्रेम का..

'ढाई अक्षर प्रेम का.....
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विद्या जरुरी है। विद्या के बिना अविद्या का आवरण दूर नहीं होता। अविद्या है तो प्रेम समस्या बन जाता है। विद्या है तो प्रेम सबसे बडा समाधान है। ढाई अक्षर प्रेम का पढे सो पंडित होय।गीता ने पंडित उसे कहा है जो सबमें एक को देखता है,एक को अनुभव करता है।यह प्रेम ही तो है निश्छल,निर्मल,निष्कपट, आधारभूत, सहृदय। यह समस्या कैसे बन सकता है?फिर भी यह समस्या बनता है। प्रेम के पीछे भय होता है। इस भय का संबंध सुख के स्वार्थ से है।
सुख छिन जाने का भय होता है। इसके कारण जिससे प्रेम है उस पर कब्जा जमाने की अधिकार वृत्ति दृढ हो जाती है।
ईर्ष्या,द्वेष,जलन, चिंता,शंका आदि की फौज घेर लेती है।
बडी अजीब बात है जो प्रेम जैसी ईश्वरीय चीज इन आसुरी चीजों से घिर जाय। फिर भी प्रकाश प्रकाश है, अंधकार अंधकार है। अंधकार चाहे जितना घना हो वह प्रकाश का मुकाबला कर ही नहीं सकता। जहां प्रकाश आया वहां उसे हटना ही पड़ता है। कोई उपाय काम नहीं आता। सारी समस्याएं प्रकाश की अनुपस्थिति से हैं।आदमी को लगता है वह प्रेम करता है। वह प्रेम की रक्षा करना चाहता है। क्या प्रेम को रक्षा की जरूरत है? क्या प्रकाश, अंधकार से बचने के लिए मजबूर है या कोई और चीज समस्या बनी हुई है?
एक बार यह समझ में आ जाय कि सुख का स्वार्थ ही प्रेम बना हुआ है तो रास्ता साफ हो सकता है समझ का।पूरा नेटवर्क एक साथ दिखाई पड सकता है। जहां सुख का स्वार्थ है वहां सुख छीने जाने का भय होगा ही। जहां भय है वहां प्रेम को अनेक रंग रुपों में ढालने की कोशिश होती है।अनेक प्रकार से प्रेम का प्रदर्शन होता है। लेकिन वह क्या प्रेम है?
वह तो भय है जो प्रेम शब्द का उपयोग कर रहा है। वहां प्रेम है ही नहीं। यदि सुख नहीं मिलता हो तो प्रेम होता है क्या?
जहां घृणा होती है वहां प्रेम छोड प्रेम का प्रदर्शन भी नहीं करता कोई। सुख मिलना चाहिए। सुख का स्वार्थ है तो भय भी है। भय है तो फिर निर्भरता की समस्या विकराल रूप ले लेती है। फिर उसके बिना चलता नहीं जिससे तथाकथित प्रेम होता है। यह समझ में आ जाना शुभ है कि यह प्रेम नहीं है,यह भय है। यह भय है क्यों कि सुख मिलता है,वह नष्ट हो सकता है। उस सुख का अभाव हो सकता है। यह चिंता खा जाती है। विवेकानंद ने कहा है-जो भी चीज तुम्हें निर्बल बनाती हो उसे विष के समान त्याग दो।' भौतिक सुख की चाह ही निर्बल बनाती है जिसके लिए कृष्ण कहते हैं -चाह दीन-हीन बना देती है।इसका त्याग करने के अनंतर शांति है।'
कोई कह सकता है -सब है।सब समझ में आता है फिर भी भय छूटता नहीं। तो फिर यह संचित है। पहले का संस्कार मौजूद है। इससे संघर्ष करने से कोई लाभ नहीं। भय से संघर्ष करना,खुद से संघर्ष करना है।खुद ही दो भागों में विभाजित होकर खुद से संघर्ष करता है जैसे अपने ही दो हाथ आपस में भिड जाएं। परिणाम क्या होगा? ऊर्जा की अपार क्षति। फिर उपाय क्या? उपाय यही कि अपने भय को अर्थात् अपने आपका हृदय की गहराई से स्वीकार लिया जाय, संघर्ष नहीं किया जाय,बचा न जाय, दूर नहीं भागा जाय अपने आपसे। भय में आदमी खुद से दूर भागता है।भय है भीतर,भाग रहा है बाहर। इससे कुछ न होगा।भीतर लौटना होगा, अपने उस अनुभव के साथ रहकर उसे स्वीकारना होगा। "नदी ही रास्ता है तो तैरना सीखना ही पड़ेगा।"
ऐसी बात है। भय की समस्या से बहुत लोग पीड़ित होते हैं।यह समस्या अनेक रूपों में आती है। ये सारे रुप गौण हैं।
असली समस्या भय नहीं है। असली समस्या उसका अस्वीकार है, उससे बचाव है। जो अपने भीतर है उससे कैसे बचा जा सकता है? उसका तो स्वीकार ही मार्ग है। एक अहंकारी आदमी क्रोधपूर्वक कह सकता है-वह किसीसे नहीं डरता।' तो क्या यह सच है या जब तक अहंकार है भीतर संघर्ष बना रहता है निरंतर? एक बुद्धिमान आदमी तो इस संघर्ष का अंत करना चाहेगा। वह भय को स्वीकार लेगा यदि भीतर है- चिंता,शंका, फिक्र आदि के रुप में। यदि भय नहीं है तो फिर यह सब चर्चा उसके लिए नहीं है। वह सहज अहंकार मुक्त है। यदि है तो खास बात समझने की यह है कि भयवृत्ति या किसीभी वृत्ति को स्वीकार लेना, अपने आपको स्वीकार लेना है।अपने आपको स्वीकार करके ही आदमी अपनी गहराई में उतर सकता है जिससे आत्मसाक्षात्कार का(सेल्फ रियलाइजेशन का)मार्ग प्रशस्त होता है। जो व्यक्ति अपने आपका साक्षात्कार भी करना चाहता है और स्वयं से दूर भी भाग रहा है भय आदि के कारण तो यह नहीं हो सकता।
भय बाहर है ही नहीं,भय भीतर मौजूद है भयवृत्ति के रूप में।
आदमी अपने ही भय से भयभीत है। यह उसे समझ में आ जाय तो उसे बाहरी तथाकथित भयजनक पर हंसी आ सकती है। सिर्फ भय की ही बात नहीं है, असंख्य वृत्तियां हैं और चित्त उनका संग्रहालय है। चित्त की स्थिति हृदय में है।
हृदय चित्त का स्रोत है,चित्त की अहंवृत्ति का भी। अहंवृत्ति को प्रकृति से जोड़कर देखा जा सकता है। यह अहंवृत्ति पशु-पक्षी में भी होती है।पेड पौधों में और भी सूक्ष्म रूप में होती है।जब उन्हें काटने की कोशिश की जाती है उनका प्रतिरोध दर्ज किया जा सकता है। मनुष्य में प्रतिरोध तो और ज्यादा बडा रुप ले लेता है और इसमें अहंबुद्धि का बडा हाथ होता है। वह अहंबुद्धि किसी वृत्ति को नकारात्मक कहकर उसे अपनाने से परहेज़ करती है। अहंबुद्धि, अहंवृत्ति को तभी स्वीकारती है जब सब अनुकूल हो।ऐसा होता नहीं इसलिए समस्या अटकी रहती है।निराकरण नहीं हो पाता। यही कारण है जो बिना नाम दिये,बिना अच्छा बुरा कहे हर वृत्ति के हर अनुभव को अपनाने के लिए कहा जाता है। तभी आत्मस्वीकार संभव है। क्रांति इसीसे होती है। मूल में तो अस्तित्व का अनुभव है,आत्मानुभव है। यह स्वत:हो ही रहा है।जो अनुभव हो ही रहा है वही अनुभव होते रहना पर्याप्त है।यह सामान्य हो जाना है जो बड़ी असामान्य बात है।ऐसे आदमी को पहचानना मुश्किल है।ऐसा करने वाला स्वत:मूलस्रोत हृदय में आ जाता है। अस्तित्व बोध हर एक को वहीं हो रहा है। रजोगुणी, तमोगुणी वृत्तियों से पलायन करने से मूलस्रोत से भी दूर जाना होता है। यह बाधक है। 
फिर स्व में विश्राम मिले तो मिले कैसे?अहंबुद्धि बहिर्मुखी होती है। वहां बाहर के सुख-दुख मान्य हैं।सुख मालूम पड़ता है तो प्रेम जगता है।प्रेम जगता है तो उस सुख के छिनने का भय भी होता है। यदि समझदार आदमी भय के रूप में अपने आपको पूर्णतया स्वीकार ले तो भय अपने आप समाप्त हो जाता है। जहां भय गया प्रेम प्रकटा। भय क्षणभंगुर है,प्रेम शाश्वत है। प्रेम में ही शांति है, अभय है। "अब तुम प्रेमपूर्ण हो;अब तुम प्रेम कर सकते हो। अब तुम करुणा कर सकते हो। अब तुम किसी पर निर्भर नहीं हो;उसकी जरूरत न रही।
तुमने सत्य को स्वीकार लिया;अब किसी पर निर्भर होने की जरूरत न रही। अब तुम्हें न किसी पर मालकियत करनी है और न किसीको अपने पर मालकियत करने देनी है। अब दूसरे के पीछे भागने की जरूरत न रही। तुमने स्वयं को स्वीकार कर लिया; इसी स्वीकार से प्रेम पैदा होता है।और इस प्रेम से तुम्हारे प्राण भर जाते हैं।" जब प्रेम है,सुख छीने जाने का भय नहीं है तभी निर्मल,निश्छल, निष्कपट, आधारभूत प्रेम प्रकट होता है। यही सच्चा समाधान है। हर आदमी इसीके लिए तरसता है। लोग ठीक कहते हैं - लोगों में प्रेम नहीं है। सच्चा प्रेम चाहिए,झूठे , स्वार्थ पूर्ण प्रेम से किसीको भी संतोष नहीं होता। ऐसे सच्चे प्रेम का आविर्भाव हर एक में संभव है।वह बस किसी भी रूप में मौजूद भय के रूप में अपने आपको स्वीकार ले।हृदयपूर्वक अपने आपको अपना ले। "अब तुम भय से भयभीत नहीं हो;अब तुम भय से छुटकारा पाने की चेष्टा नहीं करते हो। और चमत्कार यह है कि इस स्वीकार से ही भय विलीन हो जाता है।"आत्मविश्वास और क्या है? अहंकार का आत्मविश्वास भी कोई आत्मविश्वास है,वह तो अनुकूलता पर निर्भर है आत्मनिर्भरता इससे बिल्कुल भिन्न है और हर एक को उपलब्ध है। 'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित:।'हे अर्जुन! मैं सभी के हृदय में स्थित आत्मा हूं।"

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